मणिपुर की राजनीति में पर्दे के पीछे हलचल तेज है। पूर्व मुख्यमंत्री एन. बिरेन सिंह एक बार फिर अपने राजनीतिक भविष्य को पटरी पर लाने की कोशिशों में जुटे हैं। हालांकि, उनके करीबी सहयोगी गोविंदास के राज्य के गृह मंत्री बनने से उन्हें कुछ राहत जरूर मिली है, लेकिन मौजूदा राजनीतिक हालात संकेत देते हैं कि बिरेन सिंह की राह आसान नहीं है। उनके खेमे के कई विधायक वर्तमान मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह के करीब जाते दिख रहे हैं, जो बिरेन सिंह के लंबे समय से राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी माने जाते हैं।
बिरेन सिंह का राजनीतिक सफर मणिपुर में उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। पत्रकारिता से राजनीति में आए बिरेन सिंह ने राज्य की सत्ता में मजबूत पकड़ बनाई थी और मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक नियंत्रण को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया। हालांकि, जातीय तनाव, सुरक्षा चुनौतियों और राजनीतिक अस्थिरता के दौर में उनकी स्थिति कमजोर होती चली गई। सत्ता से हटने के बाद से ही वे धीरे-धीरे अपनी राजनीतिक जमीन दोबारा तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं।
हालिया घटनाक्रम में उनके विश्वासपात्र गोविंदास को गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी मिलना बिरेन सिंह के लिए एक रणनीतिक बढ़त के तौर पर देखा जा रहा है। गृह मंत्रालय मणिपुर जैसे संवेदनशील राज्य में बेहद अहम विभाग माना जाता है, जहां आंतरिक सुरक्षा और शांति बहाली सबसे बड़ी प्राथमिकताएं हैं। एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक के अनुसार, “गृह मंत्रालय में अपने करीबी को देखना बिरेन सिंह के लिए प्रशासनिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर प्रभाव बनाए रखने का जरिया हो सकता है।”
इसके बावजूद, बिरेन सिंह के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने विधायकों को एकजुट रखना है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि उनके समर्थक माने जाने वाले कुछ विधायक अब मुख्यमंत्री खेमचंद सिंह के साथ बेहतर तालमेल बैठा रहे हैं। सत्ता के केंद्र के करीब रहना भारतीय राजनीति की एक व्यावहारिक सच्चाई मानी जाती है, और मणिपुर में भी यह प्रवृत्ति साफ दिखाई दे रही है। इससे बिरेन सिंह की सौदेबाजी की ताकत कमजोर पड़ सकती है।
वर्तमान मुख्यमंत्री खेमचंद सिंह ने अब तक संतुलित रुख अपनाया है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से किसी गुटबाजी को बढ़ावा नहीं दिया, लेकिन प्रशासनिक फैसलों और नियुक्तियों के जरिए अपनी पकड़ मजबूत की है। उनके समर्थकों का कहना है कि राज्य को स्थिरता की जरूरत है और किसी भी तरह की आंतरिक राजनीति से बचना जरूरी है। वहीं, बिरेन सिंह समर्थकों का मानना है कि अनुभव और जमीनी पकड़ के कारण बिरेन सिंह अब भी एक प्रभावशाली नेता बने हुए हैं।
राजनीतिक पृष्ठभूमि को समझना यहां जरूरी है। मणिपुर लंबे समय से जातीय विविधता, सीमावर्ती सुरक्षा चुनौतियों और केंद्र–राज्य संबंधों की जटिलताओं से जूझता रहा है। ऐसे माहौल में नेतृत्व का सवाल केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि प्रशासनिक क्षमता और सामाजिक संतुलन से भी जुड़ा होता है। बिरेन सिंह अपने समर्थकों के बीच यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि वे इन चुनौतियों से निपटने का अनुभव रखते हैं।
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि वापसी की राह केवल रणनीतिक नियुक्तियों से तय नहीं होती। एक राजनीतिक टिप्पणीकार के अनुसार, “अगर बिरेन सिंह को मजबूत वापसी करनी है, तो उन्हें न सिर्फ विधायकों का भरोसा जीतना होगा, बल्कि यह भी दिखाना होगा कि वे बदले हुए राजनीतिक और सामाजिक हालात में नई भूमिका निभा सकते हैं।” यह संकेत देता है कि उनकी रणनीति को अब केवल बैकरूम समीकरणों से आगे बढ़कर सार्वजनिक और राजनीतिक स्तर पर भी स्वीकार्यता बनानी होगी।
फिलहाल, बिरेन सिंह की चालें सावधानी और प्रतीक्षा की रणनीति पर आधारित दिखती हैं—जहां वे सीधे टकराव से बचते हुए सही मौके की तलाश में हैं। लेकिन जिस तरह से उनके खेमे में खिसकन की खबरें आ रही हैं, उससे यह साफ है कि उनकी वापसी “पंख और दुआ” के सहारे ही संभव हो पाएगी। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि यह प्रयास उन्हें दोबारा सत्ता के केंद्र के करीब लाता है या मणिपुर की राजनीति में उनका प्रभाव धीरे-धीरे सीमित होता चला जाता है।
