नई दिल्ली — केंद्र सरकार द्वारा पेश किए गए बजट 2026 में इस बार चुनावी राज्यों के लिए किसी बड़े वित्तीय प्रोत्साहन या विशेष पैकेज की घोषणा नहीं की गई है। यह रुख पिछले वर्षों से अलग माना जा रहा है, जब विधानसभा चुनावों से पहले कई राज्यों को बजट भाषण में विशेष उल्लेख और अतिरिक्त सहायता मिली थी। वित्तीय प्रावधानों की यह संयमित प्रस्तुति ऐसे समय में आई है, जब देश के कई प्रमुख राज्यों में आगामी महीनों में चुनाव होने हैं और राजनीतिक अपेक्षाएं स्वाभाविक रूप से अधिक थीं।
पांच वर्ष पहले, पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों का केंद्रीय बजट में विशेष रूप से उल्लेख किया गया था। उस समय इन राज्यों के लिए बुनियादी ढांचे, कृषि, रेल परियोजनाओं और सामाजिक कल्याण योजनाओं से जुड़े कई बड़े ऐलान किए गए थे। इन घोषणाओं को चुनावी रणनीति से जोड़कर भी देखा गया था। इसके विपरीत, बजट 2026 में केंद्र सरकार ने किसी विशेष राज्य या क्षेत्र को लक्षित करते हुए बड़े पैमाने पर अनुदान या नई योजनाओं की घोषणा से परहेज किया है।
वित्त मंत्रालय से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि इस बार बजट का फोकस दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता, राजकोषीय अनुशासन और राष्ट्रीय स्तर की प्राथमिकताओं पर रहा है। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा, “बजट का उद्देश्य किसी विशेष राज्य को लाभ पहुंचाना नहीं, बल्कि समग्र आर्थिक विकास को गति देना है।” उनके अनुसार, सरकार ने बुनियादी ढांचे, विनिर्माण, रोजगार सृजन और डिजिटल अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्रों में निवेश को प्राथमिकता दी है, जिससे सभी राज्यों को समान रूप से लाभ मिल सके।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह बदलाव केंद्र सरकार की बजटीय रणनीति में परिपक्वता का संकेत भी हो सकता है। पिछले कुछ वर्षों में चुनावी वर्षों के दौरान बजट में क्षेत्रीय घोषणाओं को लेकर आलोचना होती रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार सरकार ने उन आरोपों से बचने की कोशिश की है कि बजट का उपयोग चुनावी लाभ के लिए किया जा रहा है। एक जाने-माने आर्थिक विश्लेषक ने कहा, “यह बजट संकेत देता है कि सरकार अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के बजाय दीर्घकालिक आर्थिक लक्ष्यों को प्राथमिकता देना चाहती है।”
हालांकि, विपक्षी दलों ने इस रुख पर सवाल भी उठाए हैं। कुछ विपक्षी नेताओं का कहना है कि चुनावी राज्यों की विशिष्ट जरूरतों को नजरअंदाज किया गया है। उनका तर्क है कि जिन राज्यों में विकास की चुनौतियां अधिक हैं, वहां केंद्र की ओर से अतिरिक्त सहायता अपेक्षित थी। विपक्ष का यह भी कहना है कि महंगाई, बेरोजगारी और कृषि संकट जैसे मुद्दों से जूझ रहे राज्यों को विशेष पैकेज से राहत मिल सकती थी।
राजनीतिक पृष्ठभूमि में देखें तो भारत में केंद्रीय बजट का चुनावी महत्व हमेशा रहा है। आजादी के बाद से कई बार बजट में लोकलुभावन घोषणाएं की गईं, खासकर तब जब किसी राज्य या समूह में चुनाव नजदीक हों। हाल के वर्षों में भी यह प्रवृत्ति देखी गई कि चुनावी राज्यों को विशेष परियोजनाओं या योजनाओं के जरिए संबोधित किया गया। ऐसे में बजट 2026 का संतुलित और अपेक्षाकृत तटस्थ स्वर राजनीतिक विश्लेषकों के लिए भी चर्चा का विषय बन गया है।
केंद्र सरकार का तर्क है कि राज्यों के लिए वित्तीय सहायता का एक संस्थागत ढांचा पहले से मौजूद है, जैसे वित्त आयोग की सिफारिशें, केंद्रीय प्रायोजित योजनाएं और राज्यों के साथ साझा परियोजनाएं। बजट के माध्यम से अलग-अलग राज्यों को लक्षित करना आवश्यक नहीं है, क्योंकि विकास योजनाएं पूरे देश के लिए बनाई जाती हैं। वित्त मंत्री ने अपने भाषण में भी इस बात पर जोर दिया कि “संतुलित विकास ही टिकाऊ विकास का आधार है।”
आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि बजट 2026 का यह संयमित दृष्टिकोण चुनावी राजनीति को किस तरह प्रभावित करता है। जहां एक ओर सरकार इसे नीति-आधारित और जिम्मेदार बजट के रूप में पेश कर रही है, वहीं विपक्ष इसे अवसर चूकने के रूप में देख रहा है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि इस बार केंद्रीय बजट ने चुनावी राज्यों के लिए बड़े और सीधे लाभकारी ऐलानों से दूरी बनाकर एक अलग संदेश देने की कोशिश की है।
