नई दिल्ली: प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमिटी (I-PAC) से जुड़ी जांच को लेकर तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने समय और मंशा पर गंभीर सवाल उठाए हैं। राज्यसभा सांसद साकेत गोखले ने आरोप लगाया कि 2022 के गोवा विधानसभा चुनावों से जुड़ी जांच अचानक पश्चिम बंगाल में आगामी चुनावों से ठीक पहले तेज की गई है, जिससे राजनीतिक उद्देश्यों की आशंका पैदा होती है।
साकेत गोखले ने संसद परिसर के बाहर पत्रकारों से बातचीत में कहा, “जब यह मामला 2022 के गोवा चुनावों से जुड़ा है, तो फिर ED अब क्यों जागी है? क्या बंगाल चुनावों से पहले यह कार्रवाई महज संयोग है?” उन्होंने कहा कि जांच एजेंसियों की भूमिका और समय विपक्षी दलों के बीच गहरी चिंता का विषय बन गया है।
इस मुद्दे पर TMC सांसदों ने दिल्ली के कर्तव्य भवन के पास शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया, जिसे लेकर भी पार्टी ने कड़ी आपत्ति जताई है। गोखले के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान सांसदों के साथ कथित तौर पर दुर्व्यवहार किया गया। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा, “आठ सांसद शांतिपूर्वक विरोध कर रहे थे, लेकिन उन्हें घसीटा गया और बेरहमी से संभाला गया। क्या देश की राजधानी में निर्वाचित सांसदों के साथ ऐसा व्यवहार होना चाहिए?”
इस घटनाक्रम ने एक बार फिर केंद्रीय जांच एजेंसियों की भूमिका को लेकर राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है। पिछले कुछ वर्षों में कई विपक्षी दल यह आरोप लगाते रहे हैं कि ED और अन्य एजेंसियों का इस्तेमाल चुनावी राज्यों में दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है। TMC का कहना है कि बंगाल में चुनाव नजदीक आने के साथ ही इस तरह की कार्रवाइयों का पैटर्न साफ दिखने लगा है।
I-PAC, जो चुनावी रणनीति और राजनीतिक परामर्श देने के लिए जाना जाता है, पहले भी विभिन्न राज्यों और दलों के साथ काम कर चुका है। 2022 के गोवा विधानसभा चुनावों में भी इसकी भूमिका को लेकर सवाल उठे थे, जिसके बाद जांच की प्रक्रिया शुरू हुई थी। हालांकि, विपक्ष का तर्क है कि यदि मामला पुराना है, तो जांच में अचानक आई तेजी का कारण स्पष्ट किया जाना चाहिए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी माहौल में किसी भी जांच एजेंसी की कार्रवाई स्वाभाविक रूप से राजनीतिक चश्मे से देखी जाती है। एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक के अनुसार, “जब चुनाव नजदीक होते हैं, तब ऐसी कार्रवाइयों को निष्पक्ष साबित करने की जिम्मेदारी एजेंसियों पर और बढ़ जाती है। पारदर्शिता की कमी अविश्वास को जन्म देती है।”
सरकार और ED की ओर से इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा गया है कि एजेंसी कानून के तहत स्वतंत्र रूप से काम करती है और जांच का चुनावी राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। सरकारी सूत्रों का कहना है कि किसी भी मामले में समय-सीमा साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रियाओं पर निर्भर करती है, न कि राजनीतिक घटनाक्रम पर।
इसके बावजूद, TMC और अन्य विपक्षी दलों का कहना है कि बार-बार ऐसे मामलों का चुनावों से ठीक पहले सामने आना संदेह पैदा करता है। पश्चिम बंगाल में पहले भी केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई को लेकर राजनीतिक टकराव देखने को मिल चुका है, जहां TMC ने इसे संघीय ढांचे और राज्य की स्वायत्तता से जोड़कर देखा है।
इस पूरे विवाद का असर संसद के भीतर और बाहर दोनों जगह महसूस किया जा रहा है। विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर एकजुटता दिखाने के संकेत दिए हैं और आने वाले दिनों में संसद में इस पर तीखी बहस की संभावना है। वहीं, सत्तारूढ़ पक्ष का कहना है कि कानून अपना काम कर रहा है और किसी भी तरह का राजनीतिक दबाव नहीं डाला जा रहा।
फिलहाल, ED की कार्रवाई और TMC के विरोध ने चुनावी राजनीति के माहौल को और गरमा दिया है। यह देखना अहम होगा कि जांच आगे किस दिशा में बढ़ती है और क्या यह मुद्दा बंगाल चुनावों में एक बड़ा राजनीतिक सवाल बनकर उभरता है।
