पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारी तेज़ करते हुए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने राज्य में बाहरी राज्यों से आए वरिष्ठ नेताओं और संगठनात्मक पदाधिकारियों को तैनात किया है, जिन्हें पार्टी के भीतर ‘शांतिदूत’ या peacekeepers के रूप में देखा जा रहा है। इन नेताओं को औपचारिक रूप से ‘प्रवासी सदस्य’ कहा जाता है और इन्हें मुख्य रूप से हिंदी भाषी राज्यों तथा कर्नाटक से पश्चिम बंगाल भेजा गया है।
भाजपा नेतृत्व का कहना है कि इन प्रवासी सदस्यों की नियुक्ति का मुख्य उद्देश्य चुनाव प्रचार की निगरानी के साथ-साथ स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच मतभेदों को सुलझाना और संगठनात्मक समन्वय को मजबूत करना है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, बंगाल इकाई में पिछले कुछ समय से गुटबाजी, समन्वय की कमी और पुराने-नए कार्यकर्ताओं के बीच मतभेद जैसी समस्याएं सामने आई हैं, जिनका समाधान चुनाव से पहले आवश्यक माना जा रहा है।
इन प्रवासी सदस्यों को मंडल, जिला और विधानसभा स्तर पर जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। वे स्थानीय नेताओं, बूथ कार्यकर्ताओं और संगठन पदाधिकारियों के साथ नियमित बैठकें कर रहे हैं। पार्टी का मानना है कि बाहरी नेताओं की मौजूदगी से संगठनात्मक फैसलों में निष्पक्षता बनी रहती है और स्थानीय विवादों को बिना पक्षपात के सुलझाया जा सकता है।
एक वरिष्ठ प्रवासी सदस्य ने कहा, “हमारा काम केवल चुनावी रणनीति तक सीमित नहीं है। सबसे बड़ी प्राथमिकता यह है कि स्थानीय कार्यकर्ता एकजुट होकर काम करें और आपसी मतभेदों को पीछे छोड़ें।” पार्टी का मानना है कि जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच सामंजस्य के बिना किसी भी बड़े चुनावी लक्ष्य को हासिल करना संभव नहीं है।
भाजपा का यह कदम ऐसे समय में सामने आया है जब पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ मुकाबला कड़ा माना जा रहा है। 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने राज्य में एक प्रमुख विपक्षी दल के रूप में उभरकर अपनी स्थिति मजबूत की थी, लेकिन सत्ता तक पहुंचने के लिए पार्टी अब भी संगठनात्मक मजबूती और जनसंपर्क को निर्णायक मान रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, प्रवासी सदस्यों की तैनाती भाजपा की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसमें केंद्रीय नेतृत्व राज्य इकाइयों पर सीधी निगरानी रखता है। इससे पार्टी संदेश, रणनीति और संगठनात्मक अनुशासन में एकरूपता बनाए रखने में मदद मिलती है। यह मॉडल भाजपा द्वारा अन्य राज्यों में भी अपनाया जा चुका है, खासकर वहां जहां संगठनात्मक मतभेद सामने आए हों।
हालांकि, विपक्षी दल इस रणनीति पर सवाल भी उठा रहे हैं। उनका कहना है कि बाहरी नेताओं की तैनाती से स्थानीय नेतृत्व की भूमिका सीमित हो सकती है। वहीं भाजपा का तर्क है कि प्रवासी सदस्य किसी भी तरह से स्थानीय नेतृत्व को कमजोर नहीं करते, बल्कि उन्हें सहयोग और मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार, “प्रवासी सदस्य फैसले थोपने नहीं आते। वे संगठन को सुनते हैं, समझते हैं और समाधान सुझाते हैं।” पार्टी का दावा है कि इससे कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ता है और चुनावी तैयारी अधिक व्यवस्थित होती है।
बंगाल में भाजपा का फोकस उन क्षेत्रों पर भी है जहां पिछले चुनाव में जीत का अंतर कम रहा था या पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था। प्रवासी सदस्यों को ऐसे इलाकों में बूथ प्रबंधन, मतदाता संपर्क और संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने की जिम्मेदारी दी गई है।
जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, भाजपा के लिए यह रणनीति निर्णायक साबित हो सकती है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि चुनावी सफलता केवल प्रचार से नहीं, बल्कि संगठित, एकजुट और अनुशासित कार्यकर्ताओं से सुनिश्चित होती है। ऐसे में ‘शांतिदूतों’ की भूमिका बंगाल के चुनावी समीकरण में अहम मानी जा रही है।
आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि भाजपा की यह पहल संगठनात्मक एकता को कितनी मजबूती देती है और क्या यह पार्टी को बंगाल की राजनीतिक लड़ाई में निर्णायक बढ़त दिला पाती है।
