पश्चिम बंगाल में राजनीति एक बार फिर सांस्कृतिक पहचान के इर्द-गिर्द सिमटती दिख रही है। इस बार मुद्दा विकास, कानून-व्यवस्था या रोजगार नहीं, बल्कि भोजन है—विशेष रूप से मछली और मांस। जैसे-जैसे 2026 के विधानसभा चुनाव नज़दीक आते जा रहे हैं, “मछली-मांस” की बहस राज्य की राजनीति में एक नया मोड़ ले चुकी है, जो भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में उभर रही है।
हाल के दिनों में बिहार में मांस और मछली की खुले में बिक्री को लेकर दिए गए बयानों और प्रस्तावित नियमन ने इस बहस को हवा दी। भले ही ये फैसले बिहार तक सीमित बताए गए हों, लेकिन पश्चिम बंगाल में इसे सांस्कृतिक हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने इस मुद्दे को तेजी से लपकते हुए इसे बंगाली जीवन-शैली पर हमले के रूप में पेश किया है।
TMC का कहना है कि बंगाल की पहचान मछली-भात से जुड़ी है और यहां मछली केवल भोजन नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और आजीविका का हिस्सा है। पार्टी नेताओं का तर्क है कि किसी भी प्रकार की पाबंदी या नैतिक नियंत्रण की सोच बंगाली समाज की बहुलतावादी प्रकृति के खिलाफ है। यही कारण है कि TMC इस मुद्दे को भावनात्मक और सांस्कृतिक विमर्श में बदलने में सफल रही है।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने स्पष्ट रूप से कहा है कि बंगाल शाकाहारी राज्य नहीं है और यहां मछली-मांस का व्यापार लाखों लोगों की रोज़ी-रोटी से जुड़ा है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर भोजन की आदतों को नियंत्रित करने की कोशिश की गई, तो इसका असर छोटे व्यापारियों, मछुआरों और आम लोगों पर पड़ेगा।
दूसरी ओर, भाजपा ने इन आरोपों को भ्रामक बताते हुए कहा है कि पार्टी बंगाल में मछली या मांस पर किसी भी तरह के प्रतिबंध के पक्ष में नहीं है। भाजपा के प्रदेश नेतृत्व ने यह दोहराया है कि लोगों को अपनी पसंद का भोजन करने की पूरी आज़ादी है और पार्टी केवल कानून-व्यवस्था और स्वच्छता से जुड़े नियमों की बात करती है, न कि सांस्कृतिक पाबंदियों की।
इसके बावजूद, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा को इस मुद्दे पर संचार की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। बंगाल में पहले से ही यह धारणा मौजूद है कि पार्टी उत्तर और पश्चिम भारत की सांस्कृतिक सोच के साथ राज्य की राजनीति को देखती है। “मछली-मांस” का मुद्दा इस धारणा को और मजबूत कर सकता है।
कोलकाता स्थित एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक का कहना है, “बंगाल में भोजन सिर्फ निजी पसंद नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का विषय है। जब राजनीति भोजन तक पहुंचती है, तो मतदाता इसे सीधे अपनी अस्मिता से जोड़ लेते हैं। यह किसी भी पार्टी के लिए संवेदनशील क्षेत्र होता है।”
आर्थिक दृष्टि से भी यह विषय महत्वपूर्ण है। पश्चिम बंगाल देश के प्रमुख मछली उत्पादक राज्यों में शामिल है। राज्य की बड़ी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मछली पालन, व्यापार और निर्यात से जुड़ी हुई है। ऐसे में भोजन से जुड़ा कोई भी राजनीतिक संदेश केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि आर्थिक प्रभाव भी रखता है।
TMC इस पूरे विवाद को भाजपा बनाम बंगाली संस्कृति के रूप में प्रस्तुत कर रही है, जबकि भाजपा इसे राजनीतिक रूप से बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया मुद्दा बता रही है। दोनों पक्षों के बीच बयानबाज़ी तेज़ है और सोशल मीडिया से लेकर ज़मीनी राजनीति तक यह बहस लगातार गहराती जा रही है।
आने वाले महीनों में यह साफ़ होगा कि “मछली-मांस” का मुद्दा केवल एक अस्थायी राजनीतिक शोर बनकर रह जाता है या वास्तव में यह 2026 के चुनावी नैरेटिव को प्रभावित करता है। फिलहाल इतना तय है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में भोजन अब सिर्फ थाली तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सत्ता की लड़ाई का अहम हिस्सा बन चुका है।
