नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और उसके संभावित आर्थिक प्रभावों को लेकर देश की राजनीति में एक नया मुद्दा उभर कर सामने आया है। संसद का सत्र दोबारा शुरू होने के साथ ही कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने इस विषय पर विस्तृत चर्चा की मांग की है। विपक्ष का कहना है कि क्षेत्र में बढ़ते तनाव का असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा, ईंधन कीमतों और खाड़ी देशों में काम कर रहे लाखों भारतीयों पर पड़ सकता है।
संसद परिसर में विपक्षी सांसदों ने इस मुद्दे को उठाते हुए सरकार से स्पष्ट नीति और तैयारी के बारे में जानकारी मांगी। उनका तर्क है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष के कारण वैश्विक तेल और गैस बाजार में अस्थिरता पैदा हो रही है, जिससे भारत की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का कहना है कि देश की जनता को यह जानने का अधिकार है कि यदि युद्ध लंबा चलता है तो सरकार ईंधन आपूर्ति और कीमतों को कैसे नियंत्रित करेगी। कांग्रेस सांसद के.सी. वेणुगोपाल ने कहा, “ईंधन की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं और इसका सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ रहा है। ऐसे में इस मुद्दे पर संसद में व्यापक चर्चा जरूरी है।”
विपक्षी नेताओं ने यह भी चिंता जताई है कि युद्ध के कारण तेल आपूर्ति मार्गों पर खतरा बढ़ सकता है। विशेष रूप से होरमुज जलडमरूमध्य को लेकर आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं, जिसके माध्यम से दुनिया के बड़े हिस्से में तेल की आपूर्ति होती है। भारत के लिए यह मार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की बड़ी मात्रा में कच्चा तेल इसी रास्ते से आता है।
ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार भारत अपनी लगभग 85 से 90 प्रतिशत कच्चे तेल की जरूरत आयात के माध्यम से पूरी करता है, जिससे वह वैश्विक ऊर्जा बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव के प्रति काफी संवेदनशील बन जाता है। पश्चिम एशिया क्षेत्र भारत के लिए प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है, इसलिए वहां किसी भी प्रकार का संघर्ष घरेलू ईंधन कीमतों और आर्थिक स्थिरता को प्रभावित कर सकता है।
हाल के दिनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता देखी गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में संघर्ष और बढ़ता है तो वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिसका असर भारत सहित कई देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
इस बीच सरकार का कहना है कि वह स्थिति पर लगातार नजर रखे हुए है और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। सरकार के अनुसार खाड़ी देशों में रह रहे भारतीयों की सुरक्षा और सहायता सुनिश्चित करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं।
भारत के लिए पश्चिम एशिया केवल ऊर्जा का स्रोत ही नहीं बल्कि आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण क्षेत्र है। अनुमान है कि लगभग 80 से 90 लाख भारतीय नागरिक खाड़ी देशों में काम करते हैं। इन देशों से भारत में बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा भी आती है, जो देश की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि क्षेत्रीय तनाव बढ़ता है तो इससे न केवल ऊर्जा आपूर्ति बल्कि व्यापार, निवेश और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा जैसे कई मुद्दों पर असर पड़ सकता है। ऐसे में भारत के लिए स्थिति पर सतर्क नजर रखना और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की दिशा में काम करना भी जरूरी होगा।
संसद में इस विषय पर चर्चा को लेकर राजनीतिक टकराव बढ़ने की संभावना है। जहां विपक्ष सरकार से स्पष्ट रणनीति और जवाबदेही की मांग कर रहा है, वहीं सरकार का कहना है कि वह स्थिति से निपटने के लिए आवश्यक कदम उठा रही है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद और राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में बना रह सकता है।
