पंजाब के राज्यपाल की नशा मुक्ति यात्रा पर क्यों मचा सियासी तूफान
पंजाब में नशे के खिलाफ शुरू की गई राज्यपाल बनवारीलाल पुरोहित (नोट: यदि विषय के अनुसार गुलाब चंद कटारिया) की “नशा मुक्ति यात्रा” ने राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। जहां एक ओर इस पहल को नशे के खिलाफ सामाजिक जागरूकता अभियान बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर आम आदमी पार्टी (AAP) और कांग्रेस ने इस यात्रा से दूरी बनाते हुए इसके राजनीतिक निहितार्थों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस घटनाक्रम ने शिरोमणि अकाली दल (SAD) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के संभावित पुनर्मिलन की अटकलों को भी हवा दे दी है।
नशे की समस्या पंजाब में लंबे समय से एक गंभीर सामाजिक और राजनीतिक मुद्दा रही है। युवाओं में बढ़ती नशे की लत, सीमावर्ती इलाकों से होने वाली तस्करी और संगठित अपराध से इसके संबंध पर लगातार बहस होती रही है। इसी पृष्ठभूमि में राज्यपाल द्वारा शुरू की गई नशा मुक्ति यात्रा को औपचारिक रूप से एक गैर-राजनीतिक, जनहितकारी पहल बताया गया। यात्रा का उद्देश्य लोगों को नशे के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक करना और समाज के विभिन्न वर्गों को इस मुहिम से जोड़ना बताया गया है।
हालांकि, यात्रा में अकाली दल और बीजेपी नेताओं की मौजूदगी ने विवाद को जन्म दे दिया। AAP और कांग्रेस ने आरोप लगाया कि यह अभियान “राजनीतिक मंच” में बदलता जा रहा है। दोनों दलों ने यात्रा से खुद को अलग रखते हुए कहा कि नशे जैसे संवेदनशील मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। आम आदमी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “अगर सरकार नशे के खिलाफ गंभीर है, तो उसे नीतिगत और प्रशासनिक कार्रवाई पर ध्यान देना चाहिए, न कि प्रतीकात्मक यात्राओं पर।”
कांग्रेस ने भी इसी तरह की प्रतिक्रिया दी और सवाल उठाया कि राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका के दायरे में इस तरह की यात्रा कहां तक उचित है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि नशे की समस्या से निपटने के लिए जवाबदेही राज्य सरकार और कानून-व्यवस्था से जुड़े संस्थानों की है। उनका तर्क है कि राजनीतिक दलों की मौजूदगी इस पहल की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करती है।
वहीं, अकाली दल और बीजेपी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए पलटवार किया है। दोनों दलों का कहना है कि नशे के खिलाफ लड़ाई को राजनीति से ऊपर उठकर देखना चाहिए। अकाली दल के एक प्रवक्ता ने कहा, “जो दल इस यात्रा से दूर रह रहे हैं, वे नशा मुक्ति को लेकर गंभीर नहीं हैं। अगर कोई पहल समाज के हित में है, तो उसमें शामिल होने से पीछे नहीं हटना चाहिए।” बीजेपी नेताओं ने भी इसे जनहित का मुद्दा बताते हुए विपक्ष की आलोचना की है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच SAD और BJP के बीच नजदीकियों की चर्चाएं तेज हो गई हैं। कृषि कानूनों के दौर के बाद दोनों दलों के रिश्तों में आई खटास के बावजूद, हालिया घटनाएं यह संकेत दे रही हैं कि साझा मंचों पर उनकी मौजूदगी बढ़ रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नशा मुक्ति यात्रा एक सामाजिक मुद्दा होने के साथ-साथ भविष्य की राजनीतिक रणनीतियों का संकेत भी हो सकती है।
पंजाब की राजनीति में नशा हमेशा चुनावी मुद्दा रहा है। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में भी सभी दलों ने इसे प्रमुख एजेंडे के रूप में उठाया था। बावजूद इसके, जमीनी स्तर पर समस्या के पूरी तरह खत्म होने के दावे बार-बार सवालों के घेरे में रहे हैं। ऐसे में राज्यपाल की पहल को कुछ लोग सकारात्मक संकेत मान रहे हैं, तो कुछ इसे राजनीतिक संदेश के रूप में देख रहे हैं।
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि इस विवाद से यह साफ होता है कि पंजाब में नशे का मुद्दा केवल सामाजिक नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक समीकरणों से जुड़ा हुआ है। चंडीगढ़ स्थित एक विश्लेषक के अनुसार, “नशा मुक्ति यात्रा ने असल मुद्दे के साथ-साथ यह भी उजागर कर दिया है कि कौन से दल इस विषय पर साथ आ सकते हैं और कौन टकराव की राजनीति चुन रहे हैं।”
आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह यात्रा वास्तव में नशा मुक्ति के अभियान के रूप में आगे बढ़ती है या फिर पंजाब की राजनीति में नए गठजोड़ और टकराव का आधार बनती है। फिलहाल, इस पहल ने राज्य में राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है।
