श्रीनगर – नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां) ने अपनी हालिया कार्य समिति की बैठक में जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे की बहाली की मांग को औपचारिक रूप से पुनर्जीवित कर दिया है। बैठक में सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव में कहा गया है कि पार्टी “जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक स्थिति की पुनर्स्थापना के लिए अपने अटूट संकल्प” को दोहराती है। यह कदम ऐसे समय आया है जब पार्टी सरकार बनने के बाद कुछ महीनों तक प्रशासनिक व्यवस्था और राज्य के दर्जे की बहाली को प्राथमिकता देती हुई प्रतीत हो रही थी।
बैठक में मौजूद नेताओं ने बताया कि यह प्रस्ताव उस जनभावना को दर्शाता है जिसे पार्टी ने चुनाव अभियानों के दौरान प्रमुखता से उठाया था। हालांकि सरकार बनने के बाद पार्टी ने तुरंत इस मुद्दे पर आक्रामक रुख नहीं अपनाया, लेकिन अब इसे फिर केंद्रीय एजेंडा बनाया गया है।
2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद से जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति का मुद्दा क्षेत्रीय राजनीति का केंद्र बना रहा है। भूमि अधिकारों, पहचान और स्थानीय प्रशासनिक स्वायत्तता से जुड़े सवालों ने कई राजनीतिक दलों को सक्रिय रखा, जिनमें नेशनल कॉन्फ्रेंस सबसे मुखर रही है।
पार्टी के उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला ने सदस्यों को संबोधित करते हुए कहा कि यह फैसला जनता की आवाज़ का सम्मान है।
उन्होंने कहा:
“हमने जनता से जो वादे किए थे, उन्हें निभाना हमारी जिम्मेदारी है, चाहे राह कितनी भी कठिन क्यों न हो।”
पार्टी सूत्रों का कहना है कि यह कदम समर्थकों के दबाव और अपेक्षाओं का भी परिणाम है, जो चाहते थे कि सरकार इस संवेदनशील मुद्दे पर स्पष्ट दिशा दे।
2019 में केंद्र सरकार द्वारा किए गए संवैधानिक बदलावों के तहत जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त कर दिया गया था और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित किया गया था। यह निर्णय सुरक्षा, प्रशासनिक सुधार और विकास को लेकर सरकारी तर्कों पर आधारित था, लेकिन क्षेत्रीय दलों और एक बड़े वर्ग ने इसे जनता की सहमति के बिना लिया गया कदम बताया।
नेकां लगातार कहती रही है कि विशेष दर्जे और पूर्ण राज्य के दर्जे की बहाली से रोजगार, भूमि सुरक्षा और स्थानीय शासन से जुड़ी चिंताओं को दूर किया जा सकेगा। इस प्रस्ताव को पार्टी की अपनी पहचान और जनाधार को मजबूत करने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
इस मुद्दे को फिर उठाए जाने से क्षेत्र की राजनीति में नई बहस शुरू होने की संभावना है। कुछ विपक्षी दलों ने टिप्पणी की कि ऐसे प्रस्ताव विधानसभा में लाए जाने चाहिए, जबकि समर्थक मानते हैं कि इससे केंद्र सरकार पर बातचीत शुरू करने का दबाव बनेगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि पार्टी इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर कितनी गंभीरता से आगे बढ़ाती है या इसे चरणबद्ध रणनीति के हिस्से के रूप में रखती है
हालाँकि प्रस्ताव पारित होना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाएँ इस राह को जटिल बनाती हैं। किसी भी बदलाव के लिए व्यापक राजनीतिक सहमति, संसदीय समर्थन और कानूनी समीक्षा की आवश्यकता होगी। नेकां नेतृत्व ने स्वीकार किया है कि चुनौतियाँ मौजूद हैं, लेकिन सिद्धांतों पर टिके रहना आवश्यक है।
जैसे-जैसे जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक स्थिति बदल रही है, विशेष दर्जे का मुद्दा निस्संदेह आने वाली बहसों, विधान प्रक्रिया और राजनीतिक वार्ताओं को प्रभावित करेगा। अभी के लिए यह प्रस्ताव यह संकेत देता है कि पहचान, स्वायत्तता और संवैधानिक सुरक्षा से जुड़े प्रश्न अभी भी क्षेत्र की राजनीति का केंद्रीय हिस्सा हैं।
