दिल्ली की सत्ता से बाहर हुए लगभग एक वर्ष बीत चुका है, लेकिन आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने इस राजनीतिक झटके को आत्ममंथन और संगठनात्मक पुनर्निर्माण के अवसर के रूप में लिया है। 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में मिली हार ने न केवल पार्टी की एक दशक लंबी सरकार का अंत किया, बल्कि खुद केजरीवाल की नई दिल्ली सीट पर हार ने इस पराजय को और भी प्रतीकात्मक बना दिया।
2013 में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से निकलकर राजनीति में कदम रखने वाले केजरीवाल ने दिल्ली में शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सेवाओं पर केंद्रित शासन मॉडल के जरिए राष्ट्रीय पहचान बनाई थी। हालांकि, 2025 के चुनाव में मतदाताओं का रुझान बदलता दिखा और भाजपा ने स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की। इसके बाद AAP विपक्ष में आ गई और पार्टी के भविष्य को लेकर कई सवाल खड़े हो गए।
चुनावी हार के बाद केजरीवाल सार्वजनिक मंचों पर अपेक्षाकृत कम नजर आए, लेकिन पार्टी के भीतर वे लगातार सक्रिय रहे। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के अनुसार, केजरीवाल ने प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र के प्रदर्शन की समीक्षा की और उम्मीदवारों व स्थानीय कार्यकर्ताओं से फीडबैक लिया। इसका उद्देश्य केवल हार के कारणों को समझना नहीं था, बल्कि संगठन की कमजोरियों को पहचानकर उन्हें दूर करना भी था।
एक वरिष्ठ AAP नेता ने कहा, “यह दौर आत्मविश्लेषण का था। नेतृत्व ने तय किया कि शोर-शराबे की बजाय संगठन को भीतर से मजबूत करना प्राथमिकता होगी।” यह बयान पार्टी की मौजूदा रणनीति को दर्शाता है।
हार के बाद AAP ने कई राज्यों में अपने संगठनात्मक ढांचे में बदलाव किए। कुछ पुराने पदाधिकारियों को नई जिम्मेदारियां दी गईं, जबकि युवा नेताओं को आगे लाकर जमीनी स्तर पर सक्रियता बढ़ाने पर जोर दिया गया। पार्टी का फोकस अब केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय विस्तार पर है।
विशेष रूप से पंजाब, जहां AAP की सरकार है, पार्टी के लिए सबसे अहम राज्य बन गया है। पार्टी नेतृत्व मानता है कि पंजाब में स्थिर और प्रभावी शासन बनाए रखना राष्ट्रीय राजनीति में AAP की विश्वसनीयता के लिए जरूरी है। इसके अलावा, गोवा, गुजरात, उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में भी संगठन को मजबूत करने के प्रयास तेज किए गए हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, केजरीवाल और AAP के सामने सबसे बड़ी चुनौती मतदाताओं का भरोसा दोबारा हासिल करना है। दिल्ली में मध्यवर्गीय मतदाताओं के बीच पार्टी का समर्थन कमजोर पड़ा, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि केवल कल्याणकारी नीतियों पर निर्भर रहना अब पर्याप्त नहीं है। इसके चलते पार्टी अब क्षेत्रीय मुद्दों, स्थानीय नेतृत्व और मजबूत संगठन पर अधिक ध्यान दे रही है।
केजरीवाल ने हाल के महीनों में संकेत दिए हैं कि AAP खुद को पारंपरिक राजनीतिक दलों के विकल्प के रूप में प्रस्तुत करती रहेगी। पार्टी का मानना है कि पारदर्शिता, सुशासन और जनसरोकारों पर आधारित राजनीति आज भी उसकी सबसे बड़ी ताकत है।
दिल्ली की हार ने AAP को झटका जरूर दिया है, लेकिन पार्टी इसे अंत नहीं मानती। केजरीवाल की रणनीति स्पष्ट है—संगठन को मजबूत करना, राज्यों में विश्वसनीय नेतृत्व तैयार करना और धीरे-धीरे राजनीतिक जमीन वापस हासिल करना। आने वाले विधानसभा चुनाव यह तय करेंगे कि AAP एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावी भूमिका निभा पाती है या क्षेत्रीय दायरे तक सीमित रह जाती है।
