पटना: बिहार की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) प्रमुख लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव के हालिया बयानों और सार्वजनिक गतिविधियों ने सियासी अटकलों को हवा दे दी है। तेज प्रताप का भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेताओं के प्रति नरम रुख और उनके एक कार्यक्रम में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी को कई लोग संभावित राजनीतिक समीकरणों में बदलाव के संकेत के रूप में देख रहे हैं। इसी के साथ यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या लालू यादव परिवार और भाजपा के बीच लंबे समय से चली आ रही तल्खी में अब कुछ नरमी आ रही है।
हाल ही में आयोजित दही-चूड़ा भोज ने इन चर्चाओं को और तेज कर दिया। इस कार्यक्रम में बिहार के उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा सहित कई भाजपा नेता शामिल हुए। कार्यक्रम के दौरान जब तेज प्रताप यादव से यह सवाल किया गया कि यदि भाजपा उन्हें विधान परिषद (MLC) के लिए नामित करती है तो उनका रुख क्या होगा, तो उन्होंने जवाब दिया, “जो भी जिम्मेदारी दी जाएगी, मैं उसे स्वीकार करूंगा।” इस बयान को राजनीतिक हलकों में काफी अहम माना जा रहा है।
तेज प्रताप यादव का यह रुख ऐसे समय सामने आया है, जब बिहार में सत्ता समीकरण लगातार बदलते रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में RJD और भाजपा एक-दूसरे के कट्टर राजनीतिक विरोधी रहे हैं। लालू यादव और भाजपा के बीच वैचारिक और राजनीतिक टकराव दशकों पुराना है। ऐसे में तेज प्रताप का भाजपा नेताओं के साथ मंच साझा करना और खुले तौर पर जिम्मेदारी स्वीकारने की बात कहना असामान्य माना जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि तेज प्रताप यादव का यह बयान केवल व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षा तक सीमित नहीं हो सकता। एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक के अनुसार, “तेज प्रताप का बयान संकेत देता है कि वे खुद को केवल RJD की पारंपरिक राजनीति तक सीमित नहीं रखना चाहते। यह एक तरह का राजनीतिक संदेश है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।”
इस पूरे घटनाक्रम में लालू प्रसाद यादव की भूमिका भी चर्चा में है। सूत्रों के मुताबिक, RJD नेतृत्व की ओर से इस पर कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं आई है, जिसे कई लोग जानबूझकर अपनाई गई नरमी के रूप में देख रहे हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि लालू यादव मौजूदा परिस्थितियों में सभी विकल्प खुले रखना चाहते हैं, खासकर तब जब बिहार की राजनीति में गठबंधन और समीकरण तेजी से बदलते रहते हैं।
पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो तेज प्रताप यादव हमेशा से अपनी अलग राजनीतिक शैली और बयानों के लिए जाने जाते रहे हैं। कभी मंदिरों में पूजा-पाठ, तो कभी विवादित बयान—वे अक्सर सुर्खियों में रहते हैं। हालांकि, इस बार उनका बयान व्यक्तिगत छवि से आगे जाकर बड़े राजनीतिक अर्थों से जोड़ा जा रहा है।
भाजपा की ओर से भी इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट बयान नहीं दिया गया है, लेकिन पार्टी सूत्रों का कहना है कि भाजपा बिहार में हर संभावित राजनीतिक विकल्प पर नजर रखे हुए है। एक भाजपा नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “राजनीति में कोई दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं होता।” इस बयान से यह संकेत मिलता है कि भाजपा भी तेज प्रताप के रुख को पूरी तरह नकार नहीं रही है।
RJD के भीतर भी इस घटनाक्रम को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएं हैं। पार्टी के कुछ नेताओं का मानना है कि यह तेज प्रताप का व्यक्तिगत बयान है और इसे पार्टी की आधिकारिक नीति से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। वहीं, कुछ नेता इसे बदलते राजनीतिक माहौल के अनुरूप एक रणनीतिक संकेत मानते हैं।
आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि तेज प्रताप यादव के ये संकेत केवल बयानबाजी तक सीमित रहते हैं या वास्तव में बिहार की राजनीति में किसी बड़े बदलाव की भूमिका तैयार करते हैं। फिलहाल, दही-चूड़ा भोज और उससे जुड़े बयान ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि बिहार की राजनीति में रिश्ते, संकेत और प्रतीक उतने ही अहम हैं जितने औपचारिक गठबंधन।
