नई दिल्ली: भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक विशेष स्थान रखने वाला चैंबर ऑफ प्रिंसेज़ एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। वह कक्ष, जिसने औपनिवेशिक भारत में रियासतों की राजनीति से लेकर स्वतंत्र भारत की न्यायिक और संसदीय यात्रा तक को करीब से देखा, अब कॉमनवेल्थ स्पीकर्स कॉन्फ्रेंस जैसे अंतरराष्ट्रीय आयोजन के लिए खुद को भविष्य के अनुरूप तैयार कर रहा है। यह वही ऐतिहासिक कक्ष है, जहां एक समय ब्रिटिश साम्राज्य और नवगठित भारतीय गणराज्य—दोनों के कामकाज की झलक देखने को मिली थी।
चैंबर ऑफ प्रिंसेज़ का निर्माण 1920 के दशक में किया गया था, जब ब्रिटिश शासन के दौरान देशी रियासतों के शासकों के लिए एक औपचारिक मंच की आवश्यकता महसूस की गई। इस कक्ष का उद्देश्य था रियासतों और ब्रिटिश सरकार के बीच संवाद और समन्वय को संस्थागत रूप देना। स्वतंत्रता से पहले यह कक्ष सत्ता, संवाद और समझौतों का प्रतीक था।
आजादी के बाद इस कक्ष की भूमिका पूरी तरह बदल गई। बहुत कम लोग जानते हैं कि स्वतंत्र भारत के शुरुआती आठ वर्षों तक सुप्रीम कोर्ट ने यहीं से काम किया। देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था ने जब अपनी यात्रा शुरू की, तब संसद भवन परिसर में यही कक्ष उसका अस्थायी ठिकाना बना। यहीं से संविधान की व्याख्या और कानून के शासन की नींव रखी गई। बाद में, सुप्रीम कोर्ट के अपने भवन में स्थानांतरित होने के बाद, यह कक्ष संसद पुस्तकालय के रूप में विकसित हुआ।
इतिहासकारों का मानना है कि चैंबर ऑफ प्रिंसेज़ केवल एक इमारत नहीं, बल्कि सत्ता के संक्रमण की जीवित मिसाल है। एक वरिष्ठ इतिहासकार के अनुसार, “बहुत कम स्थान ऐसे होते हैं, जहां साम्राज्यवादी शासन, स्वतंत्रता के बाद की न्यायिक व्यवस्था और संसदीय लोकतंत्र—तीनों की छाप एक साथ देखने को मिलती है।” यह टिप्पणी इस कक्ष के बहुआयामी ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करती है।
अब, दशकों बाद, यह कक्ष एक बार फिर वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका निभाने को तैयार है। कॉमनवेल्थ स्पीकर्स कॉन्फ्रेंस जैसे आयोजन के लिए इसे आधुनिक सुविधाओं के अनुरूप सुसज्जित किया जा रहा है, जबकि इसकी ऐतिहासिक पहचान को यथावत रखने पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। संसद से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि इस प्रक्रिया में विरासत संरक्षण और आधुनिक आवश्यकताओं के बीच संतुलन साधने की कोशिश की गई है।
एक वरिष्ठ संसदीय अधिकारी ने बताया, “हम चाहते हैं कि यह कक्ष अपनी ऐतिहासिक गरिमा बनाए रखते हुए भविष्य की जरूरतों को भी पूरा करे। यह केवल एक सम्मेलन स्थल नहीं, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक यात्रा का प्रतीक है।” यह दृष्टिकोण बताता है कि सरकार और संसद दोनों ही इस विरासत को केवल अतीत की वस्तु नहीं, बल्कि जीवंत परंपरा के रूप में देख रहे हैं।
चैंबर ऑफ प्रिंसेज़ का वर्तमान स्वरूप इस बात का उदाहरण है कि कैसे ऐतिहासिक इमारतों को आधुनिक लोकतांत्रिक संवाद के लिए पुनः उपयोग में लाया जा सकता है। संसद पुस्तकालय के रूप में इसने वर्षों तक सांसदों, शोधकर्ताओं और नीति निर्माताओं को ज्ञान का केंद्र प्रदान किया है। अब, अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों की मेजबानी के जरिए यह कक्ष भारत की संसदीय परंपराओं को वैश्विक मंच पर प्रदर्शित करेगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे स्थलों का चयन भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ को भी मजबूत करता है। एक विश्लेषक के शब्दों में, “जब कोई देश अपने ऐतिहासिक संस्थानों के माध्यम से वर्तमान वैश्विक संवाद की मेजबानी करता है, तो वह अपने लोकतांत्रिक आत्मविश्वास का प्रदर्शन करता है।”
जैसे-जैसे चैंबर ऑफ प्रिंसेज़ भविष्य के लिए तैयार हो रहा है, यह अतीत और वर्तमान के बीच एक सेतु के रूप में उभरता है। यह कक्ष याद दिलाता है कि भारतीय लोकतंत्र केवल संस्थाओं से नहीं, बल्कि उन स्थानों से भी आकार लेता है, जिन्होंने समय के साथ अपनी भूमिका बदली है। आने वाले दिनों में, जब यहां वैश्विक वक्ता और प्रतिनिधि एकत्र होंगे, तब यह ऐतिहासिक कक्ष एक बार फिर इतिहास रचते हुए देखा जाएगा।
