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ग्रामीण संस्थाओं पर टकराव: सु्खु बनाम चुनाव आयोग

In Politics
November 27, 2025
सु्खु सरकार बनाम हिमाचल चुनाव आयोग: पंचायत पुनर्गठन विवाद

शिमला — हिमाचल प्रदेश में State Election Commission, Himachal Pradesh (राज्य चुनाव आयोग-HPSEC) और Sukhvinder Singh Sukhu Cabinet (सु्खु सरकार) के बीच एक बार फिर राजनीतिक तथा कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। ताज़ा घटनाक्रम में, सु्खु सरकार ने राज्य की ग्रामीण स्थानीय संस्थाओं (पंचायत / स्थानीय निकायों) का पुनर्गठन (reorganisation) करने का निर्णय लिया है — लेकिन यह कदम उस प्रतिबंध के ठीक एक सप्ताह बाद आया है, जिसे चुनाव आयोग ने उपरोक्त पुनर्गठन के लिए मंजूरी देने से इनकार करते हुए लगाया था।

चुनाव आयोग की ओर से कहा गया था कि सरकार द्वारा जारी प्रस्तावित बदलावों से पंचायतों की-जनसंख्या संरचना (demographic structure), मतदाता संतुलन और निर्वाचन प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इसलिए आयोग ने स्पष्ट कहा था कि चुनाव के पूर्व ऐसी किसी भी संरचनात्मक बदलाव को लागू नहीं किया जाएगा।

लेकिन अब सरकार ने प्रशासनिक आदेश के जरिए पुनर्गठन का रास्ता अपनाया है — जिससे आयोग और सरकार के बीच नया गतिरोध उत्पन्न हो गया है।

सरकारी सूत्रों के अनुसार, राज्य मंत्रिमंडल ने पिछली सप्ताह ग्राम पंचायतों, ब्लॉक एवं जिला निकायों की सीमाओं और स्थानीय इकाइयों में फेरबदल को मंजूरी दी। सरकार का तर्क है कि यह पुनर्गठन विकास-और-प्रबंधन को बेहतर करने, स्थानीय प्रशासन को चुस्त-दुरुस्त बनाने और विकास कार्यों को तेजी से आगे बढ़ाने के उद्देश्य से है।

लेकिन चुनाव आयोग के अधिकारियों ने इसे संवैधानिक और संवेदनशील मसला बताते हुए विरोध जताया। एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस बाबत कहा कि “वोटर लिस्ट, निर्वाचन रेंडमाइज़ेशन, तथा निर्वाचन प्रणाली की निर्भरता सुरक्षित होनी चाहिए। चुनाव के पूर्व इतनी बड़ी संरचनात्मक बदलाव से मतदाता प्रभावित होंगे।”

चुनाव आयोग का कहना है कि यदि पुनर्गठन लागू होता है, तो 2020–21 के मतदाता डेटा, निर्वाचन क्षेत्र सीमांकन, और स्थानीय निकायों की मतदाता संख्या — सब पर असर पड़ेगा।

हिमाचल प्रदेश में ग्रामीण स्थानीय निकाय (पंचायत, ग्राम सभा, ब्लॉक, जिला परिषद आदि) का ढांचा वर्षों से बदलते राजनीतिक-प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुरूप रहा है। सरकारों के लिए इसे अद्यतन करना एक सामान्य प्रक्रिया है; विशेष रूप से विकास कार्यों, संसाधन प्रबंधन, बजट वितरण आदि को ध्यान में रखते हुए यह महत्वपूर्ण माना जाता है।

लेकिन चुनाव आयोग ने पहले स्पष्ट कर दिया था कि चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले किसी भी पुनर्गठन को चुनाव संपन्न होने तक स्थगित रखा जाए। उनका उद्देश्य था कि वोटर-डाटा, निर्वाचन मानचित्र और मतदान प्रणाली स्थिर बने रहें, जिससे निष्पक्ष चुनाव हो सके।

इस वजह से आयोग ने सरकार की पुनर्गठन योजना पर रोक लगाई। लेकिन अब सरकार ने उसी योजना को फिर से लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाया है — जिससे संसदीय लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और चुनावी निष्पक्षता को लेकर सवाल उठे हैं।

राजनीतिक दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं में इस पुनर्गठन को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आयी हैं। विपक्षी दलों ने सरकार के इस कदम को चुनाव आयोग के अधिकार हस्तक्षेप और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की अवहेलना करार दिया है। उनका कहना है कि यह पुनर्गठन चुनाव में असंतुलन ला सकता है, और स्थानीय प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है।

वहीं, सरकार का समर्थन करने वाले कुछ विश्लेषकों का यह कहना है कि लोकतंत्र सिर्फ चुनाव नहीं है — विकास, प्रशासन और बेहतर स्थानीय शासन भी उतने ही मायने रखते हैं। वे कहते हैं कि पुराने सीमांकन और इकाइयाँ बदल चुकी जरूरतों से मेल नहीं खातीं, इसलिए पुनर्गठन जरूरी था।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह मामला अदालत तक जाता है, तो न्यायालय द्वारा फिर से सीमांकन, मतदाता रजिस्ट्रेशन, और स्थानीय प्रतिनिधित्व की समीक्षा हो सकती है।

आने वाले महीनों में, यदि पुनर्गठन को चुनाव आयोग या अदालत ने चुनौती दी, तो यह मामला हिमाचल की आगामी पंचायत एवं स्थानीय निकाय चुनावों में एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है।

साझा उम्मीद है कि इस विवाद के समाधान के लिए एक स्वतंत्र निगरानी समिति या मध्यस्थता तंत्र स्थापित किया जाए — ताकि पुनर्गठन और चुनाव प्रक्रिया दोनों संतुलित रूप से हो सकें।

वरना, स्थानीय निकायों का पुनर्गठन सिर्फ प्रशासनिक सुधार नहीं — बल्कि चुनाव, प्रतिनिधित्व और हिमाचल के लोकतांत्रिक समीकरणों में बड़ा फेर-बदल कर सकता है।

हिमाचल में सु्खु सरकार और चुनाव आयोग के बीच यह टकराव, सिर्फ भू-भाग और प्रशासनिक इकाइयों का मसला नहीं — बल्कि लोकतंत्र, चुनाव की निष्पक्षता और विकास-प्रत्याशा के बीच जटिल समीकरण है।

पुनर्गठन की मांग और चुनाव आयोग की रोक के बीच संतुलन स्थापित करना आसान नहीं; लेकिन इस संघर्ष का नतीजा हिमाचल के ग्रामीण शासन, स्थानीय प्रतिनिधित्व और भविष्य के चुनावी माहौल को व्यापक रूप से प्रभावित कर सकता है।

यह देखना रोचक होगा कि अगले चुनावों में किस तरह से यह विवाद असर दिखाता है — क्या लोकतंत्र में सुधार की पुख्ता बुनियाद बनेगी, या नया वाद-विवाद जन्म लेगा।

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  • नमस्ते, मैं सब्यसाची बिस्वास हूँ — आप मुझे सबी भी कह सकते हैं!
    दिल से एक कहानीकार, मैं हर क्लिक, हर स्क्रॉल और हर नए विचार में रचनात्मकता खोजता हूँ। चाहे दिल से लिखे गए शब्दों से जुड़ाव बनाना हो, कॉफी के साथ नए विचारों पर काम करना हो, या बस आसपास की दुनिया को महसूस करना — मैं हमेशा उन कहानियों की तलाश में रहता हूँ जो असर छोड़ जाएँ।

    मुझे शब्दों, कला और विचारों के मेल से नई दुनिया बनाना पसंद है। जब मैं लिख नहीं रहा होता या कुछ नया सोच नहीं रहा होता, तब मुझे नई कैफ़े जगहों की खोज करना, अनायास पलों को कैमरे में कैद करना या अपने अगले प्रोजेक्ट के लिए नोट्स लिखना अच्छा लगता है।
    हमेशा सीखते रहना और आगे बढ़ना — यही मेरा जीवन और लेखन का मंत्र है।

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नमस्ते, मैं सब्यसाची बिस्वास हूँ — आप मुझे सबी भी कह सकते हैं!
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