गुजरात में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code – UCC) को लागू करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया जा रहा है। राज्य सरकार आज यूसीसी से संबंधित रिपोर्ट और प्रस्तावित विधेयक का मसौदा प्रस्तुत करने जा रही है। यह पहल उत्तराखंड में हाल ही में लागू किए गए यूसीसी मॉडल के अनुरूप मानी जा रही है, हालांकि इसमें कुछ महत्वपूर्ण बदलावों की संभावना भी जताई जा रही है।
सूत्रों के अनुसार, गुजरात के प्रस्तावित यूसीसी कानून में दंड से जुड़े प्रावधान सीधे विधेयक में शामिल किए जा सकते हैं, जबकि उत्तराखंड में ऐसे प्रावधान नियमों और अधिसूचनाओं के तहत रखे गए थे। एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताया, “गुजरात मॉडल अधिक स्पष्ट और कठोर हो सकता है, जिसमें उल्लंघनों के लिए सीधे कानूनी सजा का प्रावधान होगा।”
समान नागरिक संहिता का उद्देश्य विभिन्न धर्मों और समुदायों के लिए समान नागरिक कानून लागू करना है, विशेष रूप से विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे मुद्दों पर। वर्तमान में भारत में अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानून (Personal Laws) लागू हैं।
गुजरात सरकार ने इस दिशा में एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया था, जिसने विभिन्न पक्षों से सुझाव लेने के बाद यह रिपोर्ट तैयार की है। समिति ने कानूनी विशेषज्ञों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों से परामर्श किया है, ताकि प्रस्तावित कानून को व्यापक और संतुलित बनाया जा सके।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम न केवल कानूनी सुधार के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसका राजनीतिक प्रभाव भी व्यापक हो सकता है। एक संवैधानिक विशेषज्ञ ने कहा, “यूसीसी जैसे संवेदनशील विषय पर कानून बनाना चुनौतीपूर्ण है। इसमें सामाजिक संतुलन और संवैधानिक मूल्यों का ध्यान रखना बेहद आवश्यक है।”
भारत में यूसीसी का मुद्दा लंबे समय से बहस का विषय रहा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य को निर्देश दिया गया है कि वह नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करे। हालांकि, इसे लागू करने को लेकर विभिन्न समुदायों और संगठनों के बीच मतभेद भी रहे हैं।
उत्तराखंड देश का पहला राज्य बना जिसने हाल ही में यूसीसी कानून को लागू करने की दिशा में ठोस कदम उठाए। वहां के मॉडल को अन्य राज्यों के लिए एक संदर्भ के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, गुजरात का प्रस्तावित कानून अपने प्रावधानों और संरचना में कुछ अलग हो सकता है।
राज्य सरकार के एक अधिकारी ने संकेत दिया कि प्रस्तावित विधेयक में विवाह पंजीकरण को अनिवार्य बनाने, बहुविवाह पर प्रतिबंध और उत्तराधिकार के मामलों में समानता जैसे प्रावधान शामिल हो सकते हैं। इसके अलावा, लिव-इन रिलेशनशिप के पंजीकरण जैसे मुद्दों पर भी स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए जाने की संभावना है।
हालांकि, इस प्रस्ताव को लेकर विपक्ष और कुछ सामाजिक संगठनों ने चिंता भी जताई है। उनका कहना है कि इस तरह के कानून को लागू करने से पहले व्यापक चर्चा और सहमति बनाना जरूरी है, ताकि किसी भी समुदाय की भावनाओं को ठेस न पहुंचे।
इस बीच, केंद्र सरकार भी यूसीसी के मुद्दे पर लगातार विचार-विमर्श कर रही है। भारत का विधि आयोग ने भी इस विषय पर सुझाव मांगे थे, जिससे संकेत मिलता है कि भविष्य में इस पर राष्ट्रीय स्तर पर भी कदम उठाए जा सकते हैं।
फिलहाल, सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि गुजरात सरकार द्वारा पेश किए जाने वाले यूसीसी मसौदे में कौन-कौन से प्रावधान शामिल होंगे और यह राज्य की सामाजिक व राजनीतिक स्थिति को किस तरह प्रभावित करेगा।
