पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी अपनी राजनीतिक सक्रियता के साथ-साथ हाल के वर्षों में अपनी रचनात्मक अभिव्यक्तियों को लेकर भी लगातार चर्चा में रही हैं। कविता, संगीत और चित्रकला जैसे विविध माध्यमों में उनकी सक्रियता ने उन्हें देश के उन चुनिंदा राजनीतिक नेताओं में शामिल कर दिया है, जिनकी पहचान केवल सत्ता या नीति तक सीमित नहीं रही है।
हाल ही में सारस्वती पूजा के अवसर पर ममता बनर्जी द्वारा लिखा और स्वरबद्ध एक नया पूजा गीत सार्वजनिक किया गया। यह गीत शिक्षा, सृजन और युवा ऊर्जा के प्रतीक इस पर्व के भाव को रेखांकित करता है। गीत को तृणमूल कांग्रेस की सांसद और जानी-मानी लोकगायिका अदिति मुंशी ने स्वर दिया। गीत के बोल में आशा, आत्मविश्वास और बाधाओं को पार करने का संदेश निहित है, जो ममता बनर्जी की राजनीतिक भाषा से मेल खाता है।
इससे एक दिन पहले मुख्यमंत्री ने यह भी कहा था कि उन्होंने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के विरोध में 26 कविताएँ लिखी हैं। उनके अनुसार, ये कविताएँ उन सामाजिक और प्रशासनिक परिस्थितियों से प्रेरित हैं, जिनका असर आम नागरिकों पर पड़ रहा है। यह पहली बार नहीं है जब उन्होंने समकालीन राजनीतिक घटनाओं पर कविता को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया हो।
ममता बनर्जी की रचनात्मक यात्रा नई नहीं है। राजनीति में आने से पहले और उसके बाद भी वे नियमित रूप से कविताएँ लिखती रही हैं, चित्र बनाती रही हैं और अवसर विशेष पर गीतों की रचना करती रही हैं। उनकी कविताओं के विषयों में सामाजिक संघर्ष, आम आदमी की पीड़ा, आंदोलन, सांस्कृतिक अस्मिता और व्यक्तिगत भावनाएँ शामिल रही हैं।
कोलकाता अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले में हर वर्ष उनकी नई पुस्तकों का प्रकाशन उनकी साहित्यिक सक्रियता का प्रमाण माना जाता है। अब तक उनकी पुस्तकों की संख्या 160 से अधिक बताई जाती है, जिनमें कविता संग्रह, निबंध और चित्रों का संकलन शामिल है।
सांस्कृतिक अध्येताओं का मानना है कि ममता बनर्जी की रचनाएँ पारंपरिक अभिजात साहित्यिक ढाँचे से अलग हैं। एक विद्वान के अनुसार,
“उनकी रचनात्मक अभिव्यक्ति की सरलता और भावनात्मकता उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित करती है, जो जनता के साथ सीधे संवाद करता है।”
ममता बनर्जी ने इससे पहले भी दुर्गा पूजा, छठ पूजा और अन्य सांस्कृतिक अवसरों पर गीत लिखे हैं। दुर्गा पूजा के लिए लिखे गए उनके गीतों को देश की प्रसिद्ध गायिकाओं ने स्वर दिया है। इन गीतों के माध्यम से वे धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक पहचान और समकालीन सामाजिक भावनाओं को जोड़ने का प्रयास करती रही हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, ये गीत केवल सांस्कृतिक प्रस्तुति नहीं हैं, बल्कि एक व्यापक जन-संवाद का हिस्सा भी हैं। इनके जरिए मुख्यमंत्री अपनी छवि को एक ऐसे नेता के रूप में प्रस्तुत करती हैं जो परंपरा, संस्कृति और आम जनता की भावनाओं से जुड़ा हुआ है
हालांकि उनकी रचनात्मक गतिविधियों को लेकर मतभेद भी हैं। कुछ आलोचक इसे राजनीति का विस्तार मानते हैं और साहित्यिक मूल्यांकन की दृष्टि से इसे सीमित बताते हैं। वहीं समर्थकों का कहना है कि कला और राजनीति का यह मेल उनकी नेतृत्व शैली का अभिन्न हिस्सा है, जो उन्हें जनता के करीब लाता है।
राजनीतिक समाजशास्त्रियों के अनुसार, ममता बनर्जी का “दीदी” व्यक्तित्व उनके लेखन, संगीत और सार्वजनिक भाषणों में समान रूप से दिखाई देता है। यह व्यक्तित्व उनके लोकप्रिय नारे “मा, माटी, मानुष” की भावना से भी जुड़ा हुआ है, जिसने उन्हें बंगाल की राजनीति में एक विशिष्ट स्थान दिलाया।
ममता बनर्जी ने 1990 के दशक में सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया और बाद में पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। उनका राजनीतिक सफर संघर्ष, आंदोलनों और सत्ता विरोधी राजनीति से होकर गुज़रा है। इसी संघर्षपूर्ण पृष्ठभूमि ने उनकी रचनात्मक अभिव्यक्तियों को भी आकार दिया है।
आज, उनकी कविताएँ, गीत और चित्र केवल व्यक्तिगत रुचि नहीं रह गए हैं, बल्कि राजनीतिक संवाद, सांस्कृतिक पहचान और जनभावनाओं को व्यक्त करने का एक समानांतर माध्यम बन चुके हैं।
