तिरुवनंतपुरम — केरल की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है, जहां सत्तारूढ़ वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) और विपक्षी कांग्रेस के नेतृत्व वाला संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (UDF) आमने-सामने हैं। आगामी चुनावों से पहले दोनों खेमों द्वारा प्रस्तावित राजनीतिक यात्राएं केवल जनसंपर्क अभियान नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन और राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई के रूप में देखी जा रही हैं।
कांग्रेस के लिए यह चुनाव विशेष रूप से अहम माना जा रहा है। बीते एक दशक से सत्ता से बाहर रही पार्टी के सामने न केवल सरकार में वापसी की चुनौती है, बल्कि अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता और गठबंधन की एकता को बनाए रखने की भी परीक्षा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर कांग्रेस इस चुनाव में फिर असफल होती है, तो UDF के भीतर असंतोष गहराने और गठबंधन के ढांचे पर असर पड़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
कांग्रेस नेतृत्व इस बार आक्रामक रणनीति अपनाने के संकेत दे रहा है। प्रस्तावित यात्रा के ज़रिए पार्टी महंगाई, बेरोज़गारी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दों को केंद्र में लाने की कोशिश कर रही है। एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा,
“यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि केरल में कांग्रेस के भविष्य का फैसला करेगा। हम जनता के मुद्दों के साथ सीधे संवाद करना चाहते हैं।”
वहीं, सत्तारूढ़ LDF अपनी सरकार की उपलब्धियों को लेकर आश्वस्त दिखाई देता है। वाम मोर्चा स्वास्थ्य सेवाओं, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं और बुनियादी ढांचे में किए गए निवेश को अपनी प्रमुख उपलब्धियों के रूप में पेश कर रहा है। मुख्यमंत्री के नेतृत्व में वाम दल यह संदेश देना चाहते हैं कि राजनीतिक स्थिरता और निरंतरता केरल के हित में है।
केरल की राजनीति का इतिहास गठबंधन सरकारों और वैचारिक प्रतिस्पर्धा से भरा रहा है। राज्य में लंबे समय से सत्ता का अदलाबदली चक्र चलता रहा है, जहां एक कार्यकाल के बाद सरकार बदलने की परंपरा देखी गई है। हालांकि, पिछले चुनाव में LDF ने इस परंपरा को तोड़ते हुए लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी की थी, जिसने कांग्रेस के लिए हालात और चुनौतीपूर्ण बना दिए।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यात्राओं की टाइमिंग और उनका नैरेटिव चुनावी माहौल को काफी हद तक प्रभावित करेगा। एक राजनीतिक विशेषज्ञ के अनुसार,
“यात्राएं अब केवल प्रतीकात्मक नहीं रहीं। ये मतदाताओं के बीच भावनात्मक जुड़ाव और राजनीतिक भरोसे की परीक्षा बन चुकी हैं।”
UDF के भीतर भी इस चुनाव को लेकर बेचैनी साफ दिखाई देती है। कुछ घटक दल मानते हैं कि कांग्रेस को अधिक निर्णायक नेतृत्व और स्पष्ट संदेश के साथ आगे आना होगा। लगातार चुनावी हार ने गठबंधन सहयोगियों के बीच यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या मौजूदा नेतृत्व के साथ आगे बढ़ना सही रणनीति है।
दूसरी ओर, भाजपा भी राज्य में अपनी मौजूदगी मजबूत करने की कोशिश कर रही है, हालांकि मुख्य मुकाबला अब भी LDF और UDF के बीच ही माना जा रहा है। फिर भी, त्रिकोणीय मुकाबले की आशंका कुछ सीटों पर समीकरण बदल सकती है।
आने वाले हफ्तों में जब दोनों पक्षों की यात्राएं ज़मीन पर उतरेंगी, तब यह स्पष्ट होगा कि जनता का मूड किस ओर झुक रहा है। कांग्रेस के लिए यह यात्रा राजनीतिक पुनर्जीवन की आखिरी उम्मीद के रूप में देखी जा रही है, जबकि LDF इसे अपनी सरकार के जनाधार की पुष्टि के अवसर के रूप में ले रहा है।
कुल मिलाकर, केरल का यह चुनाव केवल सत्ता का संघर्ष नहीं, बल्कि राज्य की राजनीति की दिशा और प्रमुख दलों के भविष्य को तय करने वाला साबित हो सकता है।
