नई दिल्ली, 12 जनवरी 2026 — केंद्र सरकार कृषि क्षेत्र में योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन और किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से एक बड़ा संरचनात्मक बदलाव करने की तैयारी में है। इसके तहत विभिन्न कृषि योजनाओं को राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (कृषि विकास योजना) के अंतर्गत एकीकृत किया जाएगा और राज्यों को मिलने वाली केंद्रीय सहायता को कृषि सुधारों के प्रदर्शन से जोड़ा जाएगा।
सरकार के प्रस्ताव के अनुसार, अब कृषि क्षेत्र में फंड आवंटन केवल योजनाओं की संख्या या बजट वितरण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह इस बात पर निर्भर करेगा कि राज्य कृषि सुधारों को कितनी गंभीरता और प्रभावी ढंग से लागू कर रहे हैं। इस कदम को कृषि नीति में परिणाम-आधारित फंडिंग की दिशा में एक अहम बदलाव माना जा रहा है।
सरकार जिन प्रमुख योजनाओं को कृषि विकास योजना के तहत लाने की तैयारी में है, उनमें शामिल हैं—
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कृष्णोन्नति योजना, जिसका उद्देश्य किसानों की आय बढ़ाना है
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राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन, जो रासायन-मुक्त और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देता है
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राष्ट्रीय मधुमक्खी एवं शहद मिशन, जो मधुमक्खी पालन और शहद उत्पादन के माध्यम से ग्रामीण आय के नए स्रोत तैयार करता है
इन योजनाओं को एक साझा ढांचे में लाने से सरकार का मानना है कि प्रशासनिक जटिलताएँ कम होंगी और संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव होगा।
नई व्यवस्था के तहत राज्यों को कृषि क्षेत्र में संरचनात्मक सुधार, जैसे प्राकृतिक खेती को अपनाना, आधुनिक तकनीकों का उपयोग, फसल विविधीकरण, बाजार तक पहुंच में सुधार और डिजिटल कृषि समाधान लागू करने होंगे। इन सुधारों के आधार पर ही केंद्र से मिलने वाली वित्तीय सहायता तय की जाएगी।
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा,
“सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कृषि योजनाओं का लाभ सीधे किसानों तक पहुंचे और राज्यों को बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रोत्साहन मिले।”
कृषि नीति विशेषज्ञों का मानना है कि योजनाओं के विलय से दोहराव कम होगा और योजनाओं की निगरानी आसान बनेगी। कृषि अर्थशास्त्री डॉ. अनिल वर्मा के अनुसार,
“परिणाम-आधारित फंडिंग से राज्यों में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और वे नवाचार तथा टिकाऊ कृषि पद्धतियों को तेजी से अपनाएंगे।”
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि प्राकृतिक खेती और मधुमक्खी पालन जैसे क्षेत्रों में निवेश से न केवल पर्यावरण को लाभ होगा, बल्कि किसानों की अतिरिक्त आय के अवसर भी बढ़ेंगे।
राष्ट्रीय कृषि विकास योजना की शुरुआत किसानों की आय बढ़ाने और कृषि क्षेत्र में संतुलित विकास को बढ़ावा देने के लिए की गई थी। यह योजना राज्यों को उनकी स्थानीय जरूरतों के अनुसार कृषि परियोजनाएं लागू करने की स्वतंत्रता देती है। इसके अंतर्गत कृषि यंत्रीकरण, फसल विविधीकरण, प्राकृतिक खेती, सिंचाई और कृषि नवाचार जैसे क्षेत्रों पर काम किया जाता है।
अब तक कृषि क्षेत्र में कई योजनाएं अलग-अलग मंत्रालयों और विभागों द्वारा संचालित की जाती रही हैं, जिससे कई बार संसाधनों के बिखराव और योजनाओं के सीमित प्रभाव की शिकायत सामने आती रही है। नई एकीकृत व्यवस्था का उद्देश्य इन्हीं समस्याओं को दूर करना है।
नई नीति से राज्यों पर दबाव बढ़ेगा कि वे केवल योजनाएं लागू न करें, बल्कि उनके मापनीय परिणाम भी दिखाएं। बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को अधिक संसाधन मिल सकते हैं, जबकि अपेक्षित सुधार न करने वाले राज्यों को सीमित सहायता मिलने की संभावना है।
सरकार का कहना है कि यह मॉडल राज्यों को कृषि क्षेत्र में जवाबदेह, पारदर्शी और नवाचार-आधारित दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित करेगा।
कृषि क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है और देश की बड़ी आबादी की आजीविका इससे जुड़ी है। ऐसे में योजनाओं का एकीकरण और सुधार-आधारित फंडिंग आने वाले वर्षों में कृषि नीति की दिशा तय कर सकता है। यह देखना अहम होगा कि राज्य सरकारें इस नई व्यवस्था के तहत कितनी तेजी और प्रभावी ढंग से बदलाव लागू कर पाती हैं।
