मणिपुर में लंबे समय से जारी जातीय तनाव को समाप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में कुकी-ज़ो शांति समझौता अब अंतिम चरण में पहुंच गया है। केंद्र सरकार द्वारा दिए गए आश्वासनों के बाद यह माना जा रहा है कि यह समझौता नागालैंड शांति समझौते की तर्ज पर तैयार किया जा रहा है, जिसमें स्वायत्तता, प्रशासनिक अधिकार और राजनीतिक भागीदारी जैसे प्रमुख बिंदु शामिल हो सकते हैं। इसी भरोसे ने तीन कुकी विधायकों, जिनमें उपमुख्यमंत्री नेमचा किपगेन भी शामिल हैं, को मैतेई नेता युमनाम खेमचंद सिंह के नेतृत्व वाली नई मणिपुर सरकार में शामिल होने के लिए प्रेरित किया।
मणिपुर में मई 2023 से मैतेई और कुकी-ज़ो समुदायों के बीच जातीय हिंसा शुरू हुई थी, जिसमें सैकड़ों लोगों की जान गई और हजारों लोग विस्थापित हुए। हिंसा के बाद राज्य में सामाजिक विभाजन गहरा गया और प्रशासनिक व्यवस्था पर भी गंभीर असर पड़ा। कुकी-ज़ो समुदाय लंबे समय से अलग प्रशासनिक व्यवस्था या अधिक स्वायत्तता की मांग करता रहा है, जबकि राज्य सरकार और मैतेई संगठनों ने इसका विरोध किया है।
इससे पहले केंद्र सरकार ने सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस (SoO) समझौते के जरिए हिंसा को नियंत्रित करने की कोशिश की थी, लेकिन यह व्यवस्था स्थायी समाधान देने में सफल नहीं हो सकी। इसी पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार ने एक व्यापक राजनीतिक समाधान की दिशा में पहल तेज की, जिसके परिणामस्वरूप कुकी-ज़ो शांति समझौते की रूपरेखा तैयार हुई।
सूत्रों के अनुसार, प्रस्तावित कुकी-ज़ो समझौता नागालैंड में हुए शांति समझौते की तर्ज पर तैयार किया जा रहा है। इसमें पूर्ण अलग राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की मांग को स्वीकार किए बिना, प्रशासनिक स्वायत्तता, वित्तीय अधिकार और स्थानीय शासन में अधिक भागीदारी जैसे प्रावधान शामिल हो सकते हैं। यह व्यवस्था पहाड़ी क्षेत्रों को अधिक निर्णय-निर्माण की शक्ति देने पर केंद्रित होगी।
गृह मंत्रालय से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा,
“सरकार का प्रयास है कि सभी पक्षों को साथ लेकर एक व्यवहारिक और टिकाऊ समाधान तैयार किया जाए। बातचीत अंतिम चरण में है और जल्द ही स्पष्ट रूपरेखा सामने आ सकती है।”
कुकी-ज़ो शांति समझौते को लेकर केंद्र के आश्वासन के बाद तीन कुकी विधायकों का नई सरकार में शामिल होना राजनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है। उपमुख्यमंत्री नेमचा किपगेन की भागीदारी को इस बात का संकेत माना जा रहा है कि कुकी नेतृत्व केंद्र के प्रस्ताव को लेकर गंभीर है। इससे सरकार को बहुमत और प्रशासनिक स्थिरता दोनों में मदद मिली है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह कदम केवल सत्ता संतुलन का मामला नहीं है, बल्कि शांति प्रक्रिया में विश्वास बहाली का भी संकेत देता है। हालांकि, कुकी-ज़ो समुदाय के भीतर भी इस समझौते को लेकर अलग-अलग मत हैं और कुछ संगठन इसे अपर्याप्त मानते हैं।
जहां एक ओर शांति समझौते को लेकर उम्मीदें बढ़ी हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ मैतेई संगठनों और नागरिक समूहों ने आशंका जताई है कि इससे राज्य की क्षेत्रीय अखंडता प्रभावित हो सकती है। उनका तर्क है कि किसी भी तरह की विशेष प्रशासनिक व्यवस्था से भविष्य में नए विवाद जन्म ले सकते हैं।
वहीं कुकी-ज़ो समुदाय का कहना है कि यह समझौता उनके लिए केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सुरक्षा, पहचान और सम्मान का सवाल है। समुदाय के एक प्रतिनिधि ने कहा,
“हम शांति चाहते हैं, लेकिन वह शांति न्याय और सम्मान के साथ होनी चाहिए। यह समझौता उसी दिशा में एक अवसर हो सकता है।”
केंद्र सरकार का लक्ष्य है कि इस शांति समझौते को औपचारिक रूप देने के बाद मणिपुर में सामान्य स्थिति बहाल की जाए और विस्थापित लोगों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित की जाए। इसके साथ ही, प्रशासनिक ढांचे में सुधार और आर्थिक पुनर्निर्माण पर भी ध्यान दिया जाएगा।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि कुकी-ज़ो शांति समझौता सफलतापूर्वक लागू होता है, तो यह न केवल मणिपुर बल्कि पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र में शांति वार्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है। हालांकि, इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे जमीनी स्तर पर कितनी ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ लागू किया जाता है।
