बेंगलुरु: कर्नाटक कांग्रेस में नेतृत्व को लेकर चल रही अंदरूनी खींचतान एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गई है। इस बार वजह बनी है मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के समर्थक माने जाने वाले कांग्रेस के 22 विधायकों की ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड की विदेश यात्रा। इस यात्रा को औपचारिक रूप से “अध्ययन दौरा” बताया जा रहा है, लेकिन इसके समय और राजनीतिक संदर्भ ने पार्टी के भीतर सत्ता संतुलन को लेकर नई अटकलों को जन्म दे दिया है।
बताया जा रहा है कि ये विधायक यह यात्रा अपने निजी खर्च पर कर रहे हैं और इसका उद्देश्य कृषि, पशुपालन और प्रशासनिक व्यवस्थाओं का अध्ययन करना है। हालांकि, राज्य के राजनीतिक गलियारों में इस दौरे को केवल अध्ययन यात्रा के रूप में नहीं देखा जा रहा। यह यात्रा ऐसे समय हो रही है जब कांग्रेस के भीतर नेतृत्व को लेकर चर्चाएं तेज़ हैं और उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के मुख्यमंत्री पद को लेकर बढ़ते दावों की भी चर्चा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यात्रा का समय संयोग मात्र नहीं है। राज्य में बजट सत्र नज़दीक है और सत्ता के भीतर शक्ति संतुलन को लेकर पहले से ही असहजता देखी जा रही है। ऐसे में बड़ी संख्या में विधायकों का एक साथ विदेश जाना, वह भी मुख्यमंत्री के करीबी माने जाने वाले नेताओं का, एक राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।
कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा,
“यह दौरा व्यक्तिगत बताया जा रहा है, लेकिन राजनीति में हर कदम का अपना संकेत होता है। इतने विधायकों की एकजुटता स्वाभाविक रूप से शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखी जाएगी।”
डिप्टी सीएम डी.के. शिवकुमार ने इस यात्रा से खुद को सार्वजनिक रूप से अलग रखा है। उनके करीबी नेताओं का कहना है कि उन्हें इस दौरे की कोई पूर्व जानकारी नहीं थी और यह पार्टी या सरकार का आधिकारिक कार्यक्रम नहीं है। इससे कांग्रेस के भीतर मौजूद दो गुटों की दूरी और स्पष्ट होती दिख रही है।
हालांकि शिवकुमार और सिद्धारमैया दोनों ही कई बार सार्वजनिक मंचों से यह कह चुके हैं कि पार्टी में कोई मतभेद नहीं है और वे कांग्रेस नेतृत्व के फैसलों का सम्मान करते हैं। बावजूद इसके, ऐसे घटनाक्रम बार-बार अंदरूनी खींचतान की ओर इशारा करते हैं।
विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ लिया है। उनका आरोप है कि सत्ता में रहते हुए कांग्रेस नेता शासन और जनहित के मुद्दों से ज़्यादा आंतरिक राजनीति में उलझे हुए हैं। विपक्ष का कहना है कि जनता से जुड़े सवालों के बजाय नेतृत्व संघर्ष सरकार की प्राथमिकता बनता जा रहा है।
2023 के विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस ने कर्नाटक में सत्ता में वापसी की थी। उस समय नेतृत्व को लेकर काफी मंथन के बाद सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री और डी.के. शिवकुमार को उपमुख्यमंत्री व प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था। इसे पार्टी के भीतर संतुलन साधने का प्रयास माना गया था।
लेकिन सत्ता में आने के बाद से ही समय-समय पर नेतृत्व परिवर्तन की अटकलें सामने आती रही हैं। शिवकुमार की सक्रियता और संगठन पर उनकी पकड़ को देखते हुए उन्हें मुख्यमंत्री पद का दावेदार माना जाता रहा है, जबकि सिद्धारमैया का समर्थक खेमा उनकी मजबूत राजनीतिक पकड़ को रेखांकित करता रहा है।
दौरे में शामिल कुछ विधायकों का कहना है कि इस यात्रा को अनावश्यक रूप से राजनीतिक रंग दिया जा रहा है। उनके अनुसार, यह केवल ज्ञान और अनुभव हासिल करने का अवसर है, जिसका लाभ राज्य की नीतियों में दिखेगा। लेकिन राजनीतिक वास्तविकता यह भी है कि सत्ता और संगठन में हर गतिविधि का अपना प्रभाव होता है।
कर्नाटक कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती इस समय अंदरूनी एकता बनाए रखना है। आने वाले महीनों में पार्टी नेतृत्व को यह तय करना होगा कि वह नेतृत्व संबंधी चर्चाओं को कैसे संभालता है। यदि असंतुलन की धारणा बनी रही, तो इसका असर सरकार की छवि और आगामी चुनावी रणनीति पर पड़ सकता है।
फिलहाल, कांग्रेस विधायकों की यह विदेश यात्रा कर्नाटक की राजनीति में एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर रही है कि क्या पार्टी वास्तव में एकजुट है, या सत्ता के भीतर खींचतान आने वाले समय में और तेज़ होगी।
