बेंगलुरु — कर्नाटक में आगामी नगर निकाय और ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी (GBA) चुनावों से पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) और जनता दल (सेक्युलर) [JD(S)] के बीच गठबंधन को लेकर असहजता साफ दिखाई देने लगी है। मुख्यमंत्री पद को लेकर पुरानी बहस के फिर से सतह पर आने और सीट बंटवारे पर सहमति न बनने से दोनों दलों के रिश्तों में तनाव बढ़ता नजर आ रहा है।
हालिया विवाद की जड़ में JD(S) की वह मांग है, जिसमें पार्टी चाहती है कि गठबंधन के भविष्य को लेकर स्पष्ट संकेत दिए जाएं और पूर्व मुख्यमंत्री एच. डी. कुमारस्वामी की भूमिका को लेकर भाजपा ठोस रुख अपनाए। इसी के साथ JD(S) ने GBA के 369 वार्डों में से 80 सीटों पर चुनाव लड़ने की मांग रखी है। सूत्रों के अनुसार, यदि भाजपा इस मांग को स्वीकार नहीं करती है तो JD(S) ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी के चुनाव अकेले लड़ने पर विचार कर रही है।
JD(S) लंबे समय से यह संकेत देती रही है कि यदि गठबंधन को दीर्घकालिक बनाना है तो नेतृत्व के सवाल पर भी चर्चा होनी चाहिए। पार्टी के कुछ नेताओं का मानना है कि कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री के रूप में पेश करना गठबंधन के सामाजिक और क्षेत्रीय आधार को मज़बूत कर सकता है। हालांकि भाजपा ने इस मांग पर अब तक कोई औपचारिक सहमति नहीं दी है।
भाजपा की कर्नाटक इकाई के अध्यक्ष बी. वाई. विजयेंद्र ने हाल ही में कहा, “हम सहयोगी दलों के साथ बातचीत के लिए हमेशा तैयार हैं। मैं कुमारस्वामी जी से मुलाकात करूंगा और सभी मुद्दों पर चर्चा की जाएगी।” उनके इस बयान को तनाव कम करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि भाजपा नेतृत्व JD(S) की प्रमुख मांगों पर कितना लचीलापन दिखाएगा।
गठबंधन में मौजूदा तनाव का सबसे ठोस कारण GBA चुनावों में सीटों का बंटवारा है। JD(S) का तर्क है कि बेंगलुरु और उसके आसपास के क्षेत्रों में उसका प्रभाव सीमित होने के बावजूद पार्टी को सम्मानजनक हिस्सेदारी मिलनी चाहिए, ताकि गठबंधन कार्यकर्ताओं में भरोसा बना रहे। दूसरी ओर, भाजपा का मानना है कि शहरी क्षेत्रों में उसका संगठनात्मक ढांचा अधिक मजबूत है और सीट बंटवारा उसी आधार पर होना चाहिए।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि नगर निकाय चुनाव अक्सर राज्य स्तरीय गठबंधनों की मजबूती की असली परीक्षा होते हैं। बेंगलुरु जैसे बड़े शहरी क्षेत्र में प्रदर्शन न केवल प्रशासनिक दृष्टि से अहम है, बल्कि 2028 के विधानसभा चुनावों के लिए राजनीतिक संकेत भी देता है।
BJP और JD(S) का गठबंधन हाल के वर्षों में कांग्रेस को चुनौती देने की रणनीति के तहत उभरा था। 2023 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी, जिसके बाद उसने क्षेत्रीय दलों के साथ तालमेल बढ़ाने पर जोर दिया। JD(S), जिसका प्रभाव मुख्य रूप से ओल्ड मैसूर क्षेत्र में रहा है, ने भी राष्ट्रीय दल के साथ गठजोड़ को अपने राजनीतिक अस्तित्व के लिए जरूरी माना।
हालांकि, दोनों दलों की वैचारिक पृष्ठभूमि और राजनीतिक प्राथमिकताएं अलग रही हैं। ऐसे में नेतृत्व और सीट बंटवारे जैसे मुद्दे बार-बार तनाव का कारण बनते रहे हैं।
यदि JD(S) वास्तव में GBA चुनाव अकेले लड़ने का फैसला करती है, तो इसका असर न केवल शहरी राजनीति पर पड़ेगा, बल्कि गठबंधन के भविष्य पर भी सवाल खड़े होंगे। इससे कांग्रेस को भी अप्रत्यक्ष लाभ मिल सकता है, जो पहले ही शहरी मतदाताओं के बीच अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, “यह गठबंधन फिलहाल रणनीतिक मजबूरी पर टिका हुआ है। यदि आपसी भरोसे और स्पष्ट समझौते की कमी रही, तो छोटे चुनाव भी बड़े राजनीतिक संदेश दे सकते हैं।”
फिलहाल, सभी की नजरें भाजपा और JD(S) के शीर्ष नेतृत्व के बीच होने वाली बातचीत पर टिकी हैं। यह बातचीत तय करेगी कि नगर निकाय चुनावों में दोनों दल साथ रहेंगे या कर्नाटक की राजनीति एक और नए मोड़ की ओर बढ़ेगी।
