कोलकाता — पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस सरकार ने गुरुवार को पेश किए गए अंतरिम बजट में अपनी प्रमुख कल्याणकारी योजनाओं के लिए आवंटन बढ़ाकर एक बार फिर सामाजिक सुरक्षा और जनकल्याण को प्राथमिकता देने का संकेत दिया है। लक्ष्मी भंडार और बांग्लार बाड़ी जैसी योजनाओं के तहत दी जाने वाली सहायता राशि में बढ़ोतरी की घोषणा की गई है। हालांकि, बढ़ते राज्य कर्ज, सरकारी कर्मचारियों के महंगाई भत्ते में वृद्धि और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत लंबित देनदारियों के भुगतान की अनिवार्यता ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या राज्य सरकार लंबे समय तक इन वादों को निभा पाएगी।
राज्य सरकार के अनुसार, लक्ष्मी भंडार योजना के तहत महिलाओं को मिलने वाली मासिक सहायता में बढ़ोतरी का उद्देश्य महंगाई के दबाव को कम करना और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को राहत देना है। वहीं बांग्लार बाड़ी योजना के लिए अतिरिक्त प्रावधान का लक्ष्य ग्रामीण और शहरी गरीबों के लिए आवास उपलब्ध कराना है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बजट के बाद कहा, “हमारी सरकार का फोकस हमेशा आम लोगों पर रहा है। सामाजिक सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करना हमारी प्राथमिकता है।”
हालांकि, वित्तीय आंकड़े राज्य की चुनौतियों की ओर भी इशारा करते हैं। पश्चिम बंगाल पहले से ही उच्च कर्ज बोझ वाले राज्यों में शामिल है। विशेषज्ञों के अनुसार, राज्य का कुल कर्ज सकल राज्य घरेलू उत्पाद के एक बड़े हिस्से के बराबर पहुंच चुका है। इसके साथ ही, हाल के वर्षों में राजस्व वृद्धि की गति अपेक्षाकृत धीमी रही है, जिससे खर्च और आय के बीच का अंतर बढ़ा है।
सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए महंगाई भत्ते में बढ़ोतरी भी राज्य के वित्त पर अतिरिक्त दबाव डाल रही है। लंबे समय से लंबित डीए भुगतान को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद सरकार पर बकाया चुकाने का दबाव बढ़ गया है। यह राशि हजारों करोड़ रुपये में आंकी जा रही है, जिससे राजकोषीय संतुलन बनाए रखना और कठिन हो गया है।
आर्थिक मामलों के जानकारों का कहना है कि कल्याणकारी योजनाएं अल्पकाल में राजनीतिक और सामाजिक समर्थन जुटाने में मदद करती हैं, लेकिन दीर्घकाल में इनके लिए स्थायी वित्तीय स्रोत जरूरी होते हैं। एक वरिष्ठ अर्थशास्त्री के अनुसार, “कल्याण योजनाएं अपने आप में नकारात्मक नहीं हैं, लेकिन जब राज्य की आय सीमित हो और कर्ज लगातार बढ़ रहा हो, तब खर्च की प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार जरूरी हो जाता है।”
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह बजट ऐसे समय में आया है जब राज्य में आगामी चुनावों को लेकर तैयारियां तेज हो रही हैं। टीएमसी सरकार की पहचान ही कल्याणकारी योजनाओं से जुड़ी रही है, जिसने पार्टी को महिलाओं और ग्रामीण मतदाताओं के बीच मजबूत आधार दिया है। लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं को सरकार अपनी सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनती है। विपक्ष हालांकि इसे “लोकलुभावन राजनीति” करार देता है और कहता है कि इससे राज्य की वित्तीय सेहत कमजोर हो रही है।
भारतीय जनता पार्टी और अन्य विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार कर्ज के सहारे योजनाएं चला रही है, जिसका बोझ भविष्य की पीढ़ियों पर पड़ेगा। उनका यह भी कहना है कि विकास और रोजगार सृजन पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा। सरकार इन आरोपों को खारिज करते हुए कहती है कि सामाजिक सुरक्षा और बुनियादी जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
पृष्ठभूमि में देखें तो पश्चिम बंगाल लंबे समय से राजकोषीय चुनौतियों से जूझता रहा है। केंद्र से मिलने वाले फंड, जीएसटी मुआवजा और राज्य के अपने कर संग्रह पर निर्भरता ने वित्तीय प्रबंधन को जटिल बनाया है। इसके बावजूद, राज्य सरकार ने शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण पर खर्च को प्राथमिकता दी है।
आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि सरकार बढ़े हुए खर्च और कानूनी दायित्वों के बीच संतुलन कैसे बनाती है। क्या राजस्व बढ़ाने के नए उपाय किए जाएंगे, या फिर खर्च में कटौती की जरूरत पड़ेगी, यह एक अहम सवाल है। फिलहाल, अंतरिम बजट ने ममता सरकार की मंशा तो स्पष्ट कर दी है, लेकिन उसकी वित्तीय क्षमता और दीर्घकालिक स्थिरता पर बहस को भी तेज कर दिया है।
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