तमिलनाडु के मंत्री और द्रविड़ मॉडल सरकार के प्रमुख चेहरों में से एक उधयनिधि स्टालिन द्वारा “संस्कृत एक मृत भाषा है” वाली टिप्पणी ने राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर एक नई बहस को जन्म दे दिया है। यह विवाद ऐसे समय में उठा है जब तमिलनाडु में चुनावी माहौल गहराता जा रहा है और भाषा, संस्कृति, पहचान तथा संघीय ढांचे को लेकर चर्चाएँ पहले से ही तेज हैं।
उधयनिधि की टिप्पणी ने तमिलनाडु की उस पुरानी बहस को फिर से आगे ला दिया है, जो अक्सर “केंद्रीकरण बनाम राज्यीय स्वायत्तता” के मुद्दे से जुड़ी रही है। राज्य लंबे समय से द्रविड़ राजनीति की उस धारा का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें स्थानीय भाषाओं, सांस्कृतिक पहचान और क्षेत्रीय स्वायत्तता को सर्वोच्च महत्व दिया गया है। ऐसे में संस्कृत जैसी भाषा—जिसे कई लोग केंद्र की सांस्कृतिक प्राथमिकताओं से जोड़कर देखते हैं—पर की गई टिप्पणी स्वाभाविक रूप से राजनीतिक प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है।
उधयनिधि ने यह बयान राज्य सरकार के बजट आवंटन और सांस्कृतिक प्राथमिकताओं से संबंधित एक कार्यक्रम में दिया था, जहां उन्होंने कहा कि “किसी भाषा के प्रति आदर अलग चीज़ है, लेकिन यह भी ज़रूरी है कि बजट और संसाधनों का उपयोग लोगों की वास्तविक ज़रूरतों के अनुसार हो।”
इस टिप्पणी के बाद विपक्षी दलों—विशेषकर भाजपा और एआईएडीएमके—ने इसे “द्रविड़ राजनीति का पुराना एजेंडा” करार दिया। भाजपा नेताओं का कहना है कि संस्कृत भारत की सभ्यता और ज्ञान परंपरा का हिस्सा है, और उसे “मृत भाषा” कहना सांस्कृतिक विरासत का अपमान है।
वहीं द्रमुक (DMK) और उसके समर्थक दलों का कहना है कि यह मुद्दा भाषा के महत्व कम और विकास के प्राथमिकताओं अधिक है। उनके अनुसार राज्य सरकार का मानना है कि सीमित संसाधनों को उन कार्यक्रमों पर खर्च किया जाना चाहिए जिनका सीधा लाभ व्यापक जनसमूह को मिले।
एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक ने इस बहस पर टिप्पणी करते हुए कहा, “यह विवाद वास्तव में भाषा का नहीं, बल्कि संसाधनों और पहचान-राजनीति का है। तमिलनाडु में चुनावी दौर में ऐसे विषय स्वाभाविक रूप से राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ाते हैं।”
राज्य में लंबे समय से हिंदी थोपने, केंद्र की सांस्कृतिक नीतियों, और केंद्र-राज्य संबंधों को लेकर संवेदनशीलता बनी हुई है। ऐसे में संस्कृत—जो अक्सर “केंद्रीय सांस्कृतिक परियोजनाओं” से जोड़कर देखी जाती है—स्वाभाविक रूप से विवाद के केंद्र में आ जाती है।
यह भी उल्लेखनीय है कि तमिलनाडु में हाल के वर्षों में शिक्षा नीति, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), राजभाषा नीतियों, और सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व के सवालों पर कई बार राजनीतिक टकराव देखा गया है। उधयनिधि का बयान इन्हीं व्यापक संदर्भों में देखा जा रहा है।
राजनीतिक तापमान के साथ-साथ सामाजिक संगठनों और भाषा-समर्थक समूहों ने भी इस मुद्दे पर अपने मत रखे हैं। एक सांस्कृतिक संगठन के प्रतिनिधि ने कहा, “संस्कृत को केवल पूजा-पाठ तक सीमित समझना सही नहीं है। यह हमारी परंपरा की नींव है। इसे मृत कहना उचित नहीं है।”
दूसरी ओर, क्षेत्रीय भाषा समर्थक समूहों का कहना है कि तमिलनाडु की भाषा नीति हमेशा से स्पष्ट रही है—तमिल को सर्वोच्च प्राथमिकता और व्यावहारिक शिक्षा मॉडल। उनका तर्क है कि युवाओं के रोजगार, तकनीक और कौशल विकास पर राज्य का ध्यान होना चाहिए, न कि उन भाषाओं पर जो सीमित उपयोग में हैं।
जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं, यह बहस और भी तेज होती दिख रही है। राजनीतिक दल इसे अपने-अपने आधार समूहों को संदेश देने के अवसर के रूप में देख रहे हैं। जहां भाजपा इसे “संस्कृति और विरासत का सम्मान” बनाकर पेश कर रही है, वहीं द्रमुक इसे “संवैधानिक स्वायत्तता और विकासात्मक प्राथमिकताओं” का विषय बता रही है।
फिलहाल यह विवाद थमता दिखाई नहीं दे रहा, और इसके चुनावी विमर्श को प्रभावित करने की संभावना प्रबल मानी जा रही है।
