नई दिल्ली — राष्ट्रपति भवन में स्वतंत्र भारत के पहले और एकमात्र भारतीय गवर्नर-जनरल Chakravarti Rajagopalachari, जिन्हें लोकप्रिय रूप से राजाजी कहा जाता है, की प्रतिमा के अनावरण के साथ ही इतिहास, विरासत और औपनिवेशिक प्रभावों को लेकर राष्ट्रीय बहस एक बार फिर केंद्र में आ गई है। इस अवसर पर राजाजी के परपोते और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता C R Kesavan ने पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों पर इतिहास को विकृत करने का आरोप लगाया और कहा कि वर्तमान सरकार औपनिवेशिक मानसिकता को तोड़ने की दिशा में काम कर रही है।
प्रतिमा अनावरण समारोह राष्ट्रपति भवन परिसर में आयोजित किया गया, जिसे भारत के स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्र निर्माण के प्रतीकों को सम्मान देने की व्यापक पहल के रूप में देखा जा रहा है। यह आयोजन ऐसे समय पर हुआ है जब सार्वजनिक स्मारकों, पाठ्यपुस्तकों और ऐतिहासिक प्रतीकों को लेकर देश में लगातार चर्चा चल रही है।
राजाजी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से एक थे। वे महात्मा गांधी के निकट सहयोगी रहे, संविधान सभा के सदस्य थे और स्वतंत्रता के बाद 1948 में भारत के गवर्नर-जनरल नियुक्त हुए। उन्होंने यह पद भारत के पूर्ण गणतंत्र बनने तक संभाला। इसके अलावा, वे लेखक, विचारक और प्रशासक के रूप में भी जाने जाते हैं।
समारोह के बाद मीडिया से बातचीत में सी. आर. केशवन ने कहा,
“पिछली कांग्रेस सरकारों ने कई महान राष्ट्रवादियों के योगदान को या तो नजरअंदाज किया या उसे सही रूप में प्रस्तुत नहीं किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी औपनिवेशिक अवशेषों को समाप्त कर रहे हैं और महान नेताओं की विरासत को उचित सम्मान दे रहे हैं।”
उनका यह बयान उस व्यापक राजनीतिक विमर्श का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें यह सवाल उठाया जा रहा है कि भारत की आज़ादी के बाद भी सार्वजनिक संस्थानों और सोच पर औपनिवेशिक प्रभाव किस हद तक बना रहा। वर्तमान सरकार इसे अक्सर “मैकाले मानसिकता” कहती है, जिसका आशय औपनिवेशिक शिक्षा और प्रशासनिक दृष्टिकोण से है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राजाजी की प्रतिमा का राष्ट्रपति भवन में स्थापित होना केवल एक प्रतीकात्मक कदम नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि राष्ट्रीय स्मृति में किन व्यक्तित्वों को प्रमुख स्थान दिया जा रहा है। समर्थकों के अनुसार, यह उन नेताओं को सम्मान देने का प्रयास है जिन्होंने स्वतंत्र भारत की बुनियाद रखने में अहम भूमिका निभाई।
हालांकि, इस कदम को लेकर आलोचनात्मक स्वर भी सामने आए हैं। कुछ इतिहासकारों और विपक्षी नेताओं का मानना है कि इतिहास की व्याख्या किसी एक राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं होनी चाहिए। उनका तर्क है कि भारत की स्वतंत्रता और लोकतंत्र का इतिहास विविध विचारों और नेताओं का साझा परिणाम है, और किसी भी बदलाव में संतुलन और व्यापक सहमति आवश्यक है।
इसके बावजूद, राजाजी के योगदान को लेकर व्यापक सहमति दिखाई देती है। उन्होंने न केवल स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया, बल्कि स्वतंत्र भारत के प्रशासनिक ढांचे को आकार देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राष्ट्रपति भवन में उनकी प्रतिमा को उस ऐतिहासिक निरंतरता के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें सत्ता और शासन भारतीय मूल्यों से जुड़ते हैं।
समारोह के दौरान राष्ट्रपति भवन में राजाजी के जीवन और विचारों पर आधारित प्रदर्शनी भी आयोजित की गई, जिसमें उनके राजनीतिक योगदान, लेखन और प्रशासनिक फैसलों को दर्शाया गया। आयोजकों के अनुसार, इसका उद्देश्य नई पीढ़ी को भारत के स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्र निर्माण की जटिलताओं से परिचित कराना है।
कुल मिलाकर, राजाजी की प्रतिमा का अनावरण केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह इस प्रश्न को भी सामने लाता है कि भारत अपने इतिहास को किस दृष्टि से देखना चाहता है — एक औपनिवेशिक विरासत के बोझ के रूप में या एक स्वतंत्र राष्ट्र की आत्मनिर्भर पहचान के रूप में।
