मुंबई — महाराष्ट्र की सियासत में एक बार फिर गठबंधन संतुलन और सत्ता-साझेदारी को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना के भीतर असहजता के संकेतों के बीच भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नगर निगमों में शक्ति-संतुलन को नए सिरे से तय करने की तैयारी में है। सूत्रों के अनुसार, भाजपा मुंबई महानगरपालिका पर अपना दावा मजबूत कर रही है, जबकि ठाणे को शिंदे शिवसेना के लिए छोड़े जाने का प्रस्ताव विचाराधीन है। वहीं, कल्याण–डोंबिवली और उल्हासनगर जैसे निगमों में, जहां दोनों सहयोगियों की संख्या लगभग बराबर है, “बराबरी” के आधार पर सत्ता साझा करने की बात सामने आई है।
यह राजनीतिक कवायद ऐसे समय हो रही है जब महायुति सरकार के भीतर भूमिकाओं और प्रभाव को लेकर सूक्ष्म खींचतान दिख रही है। नगर निकाय चुनावों को स्थानीय स्तर पर सत्ता का सेमीफाइनल माना जाता है—यहां संगठनात्मक ताकत, जमीनी नेटवर्क और संसाधनों का वास्तविक परीक्षण होता है। इसलिए, भाजपा और शिंदे शिवसेना—दोनों के लिए निगमों का नियंत्रण आगामी राजनीतिक समीकरणों की दिशा तय कर सकता है।
भाजपा का तर्क है कि मुंबई जैसे आर्थिक और प्रशासनिक केंद्र में उसकी संगठनात्मक मौजूदगी और वोट शेयर उसे नेतृत्वकारी भूमिका का अधिकार देते हैं। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “जहां हमारी ताकत स्पष्ट है, वहां नेतृत्व हमारी जिम्मेदारी बनती है। वहीं, सहयोगी दलों के प्रभाव वाले क्षेत्रों में सम्मानजनक साझेदारी ही गठबंधन को मजबूत करती है।” यह बयान सत्ता-साझेदारी की उस रूपरेखा की ओर इशारा करता है, जिसमें दावों को क्षेत्रीय यथार्थ से जोड़ा जा रहा है।
दूसरी ओर, शिंदे खेमे में यह धारणा है कि ठाणे शिवसेना का पारंपरिक गढ़ रहा है और वहां पार्टी की पकड़ और पहचान को बरकरार रखना उसके लिए अनिवार्य है। शिंदे समर्थकों का कहना है कि नगर निगमों में संतुलन बिगड़ा तो कार्यकर्ताओं के मनोबल पर असर पड़ सकता है। इसी पृष्ठभूमि में “बराबरी” का फार्मूला—खासतौर पर कल्याण–डोंबिवली और उल्हासनगर में—एक व्यावहारिक समाधान के रूप में सामने आया है।
राजनीतिक पृष्ठभूमि देखें तो 2022 में शिवसेना विभाजन के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में गठबंधन गणित लगातार बदलता रहा है। शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना का नया धड़ा सत्ता में आया, जबकि भाजपा ने बड़े भाई की भूमिका निभाई। हालांकि, समय के साथ नगर निकायों और स्थानीय संस्थाओं में प्रभाव को लेकर दोनों दलों की अपेक्षाएं अलग-अलग दिखने लगी हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, स्थानीय सत्ता संरचनाएं अक्सर राज्य और राष्ट्रीय स्तर के रिश्तों की परीक्षा लेती हैं।
एक राजनीतिक विश्लेषक का कहना है, “नगर निगमों में शक्ति-साझेदारी केवल कुर्सियों का सवाल नहीं होती; यह संगठनात्मक प्रभुत्व और भविष्य के नेतृत्व का संकेत देती है।” इसी वजह से मुंबई पर दावा और ठाणे को लेकर संवेदनशीलता—दोनों को व्यापक राजनीतिक रणनीति के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है।
कल्याण–डोंबिवली और उल्हासनगर की स्थिति खास है। यहां दोनों सहयोगियों की संख्या लगभग बराबर होने से किसी एक का वर्चस्व स्थापित करना कठिन है। ऐसे में साझा नेतृत्व, समितियों में संतुलन और प्रशासनिक जिम्मेदारियों का समान बंटवारा संभावित मॉडल माना जा रहा है। भाजपा और शिंदे शिवसेना—दोनों ही सार्वजनिक तौर पर गठबंधन की एकता पर जोर दे रहे हैं, लेकिन अंदरूनी बातचीत में शर्तें और सीमाएं स्पष्ट की जा रही हैं।
फिलहाल, कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है। संकेत यही हैं कि अंतिम समझौता चुनाव कार्यक्रमों और स्थानीय समीकरणों को ध्यान में रखकर किया जाएगा। गठबंधन नेतृत्व यह संदेश देना चाहता है कि असहजता के बावजूद संवाद जारी है और सत्ता-साझेदारी का लक्ष्य स्थिरता है, टकराव नहीं।
आने वाले हफ्तों में यह स्पष्ट होगा कि मुंबई, ठाणे और अन्य नगर निगमों में तय होने वाला यह फार्मूला महायुति की एकता को कितना मजबूत करता है। इतना तय है कि नगर निकायों की यह राजनीति राज्य की व्यापक सियासी दिशा पर गहरा असर डालेगी।
