नई दिल्ली: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की विपक्षी पहल ने संसद के भीतर राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। हालांकि यह प्रस्ताव औपचारिक रूप से सरकार के खिलाफ नहीं है, लेकिन सत्ता पक्ष ने इसे विपक्षी एकता में दरार दिखाने के अवसर के रूप में लिया है। सरकार का आकलन है कि इस कदम से विपक्षी दलों के बीच पहले से मौजूद मतभेद और गहरे होंगे, खासकर छोटे और क्षेत्रीय दलों के साथ।
सूत्रों के अनुसार, सरकार ने कई छोटे दलों और निर्दलीय सांसदों से संपर्क साधते हुए यह तर्क दिया है कि यह प्रस्ताव मुख्यतः कांग्रेस की रणनीति है, जिसका उद्देश्य संसद में राजनीतिक बढ़त बनाना है। सत्ता पक्ष का मानना है कि लोकसभा अध्यक्ष जैसे संवैधानिक पद के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव संसदीय परंपराओं के विपरीत है और इससे विपक्षी दलों में असहजता स्वाभाविक है।
विपक्षी खेमे के भीतर भी इस प्रस्ताव को लेकर एकराय नहीं दिख रही। कुछ दल इसे सरकार और अध्यक्ष की भूमिका पर सवाल उठाने का लोकतांत्रिक अधिकार मानते हैं, जबकि अन्य का मानना है कि इससे विपक्ष की सामूहिक रणनीति कमजोर हो सकती है। एक क्षेत्रीय दल के वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “यह मुद्दा संवैधानिक और प्रक्रियात्मक है। हर दल का दृष्टिकोण अलग हो सकता है, लेकिन इसे राजनीतिक हथियार बनाने से बचना चाहिए।”
सरकार की रणनीति इस बात पर केंद्रित है कि विपक्ष के भीतर मौजूद इन मतभेदों को सार्वजनिक रूप से सामने लाया जाए। संसदीय कार्य मंत्री ने हाल ही में संकेत दिया कि लोकसभा अध्यक्ष पर प्रस्ताव लाना “अनावश्यक टकराव” पैदा करता है। वहीं, सत्ता पक्ष के नेताओं का कहना है कि अध्यक्ष ने सदन का संचालन नियमों के अनुसार किया है और उन पर पक्षपात के आरोप निराधार हैं।
इस बीच, कांग्रेस ने प्रस्ताव का बचाव करते हुए कहा है कि यह कदम संसदीय प्रक्रियाओं और सदन की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है। कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि अध्यक्ष की भूमिका पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है और इससे किसी संवैधानिक पद की गरिमा कम नहीं होती। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “संसद की निष्पक्षता बनाए रखना हमारा दायित्व है। सवाल पूछना असंवैधानिक नहीं है।”
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम विपक्षी गठबंधन के लिए एक परीक्षा की घड़ी है। विश्लेषक संजय कुमार के अनुसार, “इस तरह के प्रस्ताव तभी प्रभावी होते हैं जब विपक्ष पूरी तरह एकजुट हो। यदि मतभेद खुलकर सामने आते हैं, तो सरकार को राजनीतिक लाभ मिलना तय है।” उनका कहना है कि छोटे दल अक्सर ऐसे मुद्दों पर संतुलन साधने की कोशिश करते हैं, ताकि वे न तो सरकार से पूरी तरह टकराव लें और न ही अपने समर्थक आधार को नाराज़ करें।
पृष्ठभूमि के तौर पर देखें तो भारत की संसदीय परंपरा में लोकसभा अध्यक्ष को अपेक्षाकृत निष्पक्ष और दलगत राजनीति से ऊपर माना जाता रहा है। हालांकि समय-समय पर विपक्ष द्वारा अध्यक्ष की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं, लेकिन अविश्वास प्रस्ताव जैसे कदम दुर्लभ रहे हैं। यही कारण है कि मौजूदा प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक हलकों में व्यापक चर्चा हो रही है।
आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि विपक्ष इस मुद्दे पर किस हद तक एकजुट रह पाता है। यदि मतभेद बढ़ते हैं, तो सरकार इसे अपनी रणनीतिक सफलता के रूप में पेश कर सकती है। वहीं, विपक्ष के लिए चुनौती यह होगी कि वह लोकतांत्रिक सवाल उठाने और राजनीतिक एकजुटता बनाए रखने के बीच संतुलन कैसे साधता है। संसद के भीतर चल रही यह रस्साकशी आने वाले सत्रों की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है।
