जयपुर: राजस्थान में अरावली पर्वतमाला से जुड़े खनन विवाद ने एक बार फिर राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत ने इस मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी और केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव पर तीखा हमला बोला है। गहलोत ने सवाल उठाया कि जिन खनन पट्टों को लेकर अब विवाद खड़ा किया जा रहा है, वे अधिकांशतः भाजपा शासनकाल में ही आवंटित हुए थे, तो फिर वर्तमान घटनाक्रम को कांग्रेस से कैसे जोड़ा जा सकता है।
गहलोत ने कहा कि उनकी सरकार के कार्यकाल के दौरान पर्यावरण संरक्षण और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा नेता इस मुद्दे को राजनीतिक लाभ के लिए उठा रहे हैं। गहलोत के शब्दों में, “खदानों का आवंटन भाजपा के समय हुआ था, हमारे कार्यकाल में नहीं। फिर जो कुछ आज हो रहा है, उसे कांग्रेस से जोड़ने का क्या तर्क है?” उनका यह बयान उस समय आया है जब अरावली क्षेत्र में अवैध खनन और पर्यावरणीय क्षति को लेकर बहस तेज हो गई है।
पूर्व मुख्यमंत्री ने विशेष रूप से केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि उन पर लगाए जा रहे आरोप दरअसल उनके “अंतरात्मा के बोझ” को दर्शाते हैं। गहलोत का आरोप है कि यादव पहले सरिस्का टाइगर रिजर्व में खनन की अनुमति देने के पक्ष में थे और इसके लिए संरक्षित क्षेत्र का दर्जा बदलने की कोशिश भी की गई थी। उन्होंने कहा, “भूपेंद्र यादव खुद दोषबोध से ग्रस्त हैं, इसलिए कांग्रेस पर आरोप लगा रहे हैं। सरिस्का जैसे संवेदनशील क्षेत्र में खनन की बात से अलवर में भारी नाराज़गी है।”
भाजपा की ओर से हालांकि इन आरोपों को खारिज किया गया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि अरावली क्षेत्र में अवैध खनन एक गंभीर समस्या है, जिसकी अनदेखी पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों ने की। भाजपा का तर्क है कि पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन लंबे समय से होता रहा है और मौजूदा सरकार इसे रोकने के लिए कदम उठा रही है।
अरावली पर्वतमाला भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है और यह राजस्थान, हरियाणा तथा दिल्ली क्षेत्र के पर्यावरणीय संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, अरावली क्षेत्र में खनन से भूजल स्तर में गिरावट, जैव विविधता को नुकसान और मरुस्थलीकरण का खतरा बढ़ता है। इसी कारण सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने समय-समय पर यहां खनन गतिविधियों पर सख्त रुख अपनाया है।
सरिस्का टाइगर रिजर्व, जो अरावली क्षेत्र का ही हिस्सा है, पहले भी खनन और मानव गतिविधियों के कारण विवादों में रहा है। एक समय यहां बाघों की संख्या शून्य हो जाने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर चिंता जताई गई थी, जिसके बाद संरक्षण प्रयास तेज किए गए। ऐसे में खनन को लेकर किसी भी तरह की ढील स्थानीय समुदायों और पर्यावरणविदों के बीच असंतोष का कारण बनती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अरावली खनन विवाद केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह राजस्थान की राजनीति में एक अहम हथियार बन गया है। कांग्रेस इसे भाजपा की कथित पर्यावरण-विरोधी नीतियों से जोड़ रही है, जबकि भाजपा कांग्रेस पर प्रशासनिक विफलता का आरोप लगा रही है। जयपुर के एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक के अनुसार, “यह विवाद आगामी चुनावों में पर्यावरण बनाम विकास की बहस को और तेज करेगा।”
इस बीच, अलवर और आसपास के इलाकों में स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों द्वारा विरोध प्रदर्शन भी देखने को मिल रहे हैं। उनका कहना है कि खनन से न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है, बल्कि आजीविका और स्वास्थ्य पर भी असर पड़ रहा है। कई संगठनों ने केंद्र और राज्य सरकार से अरावली क्षेत्र में सख्त संरक्षण नीति लागू करने की मांग की है।
कुल मिलाकर, अरावली खनन विवाद ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि पर्यावरण, विकास और राजनीति के बीच संतुलन बनाना कितना जटिल है। अशोक गहलोत और भाजपा के बीच जारी आरोप-प्रत्यारोप से यह मुद्दा आने वाले दिनों में और गहराने की संभावना है, जिसका असर न केवल राजनीतिक विमर्श बल्कि नीति निर्माण पर भी पड़ सकता है।
