
उत्तर प्रदेश के बाराबंकी और बहराइच जिलों को जोड़ने वाले एनएच-927 (NH-927) के विस्तारीकरण की महत्वाकांक्षी परियोजना पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। ₹6,969 करोड़ की इस योजना का उद्देश्य मध्य उत्तर प्रदेश से नेपाल सीमा तक की यात्रा को सुगम और तीव्र बनाना था, लेकिन वर्तमान में यह परियोजना प्रशासनिक फाइलों में उलझ कर रह गई है। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) और राज्य वन विभाग के बीच ‘अनापत्ति प्रमाण पत्र’ (NOC) को लेकर पैदा हुआ गतिरोध इस देरी का मुख्य कारण बना हुआ है।
70 हेक्टेयर संरक्षित वन भूमि और 9,000 से अधिक पेड़ों के इस हाईवे की जद में आने के कारण पर्यावरण और विकास के बीच एक बड़ी बहस छिड़ गई है। यदि यह गतिरोध जल्द नहीं सुलझा, तो अक्टूबर 2026 से काम शुरू करने का लक्ष्य धराशायी हो सकता है।
परियोजना का अवलोकन: सामरिक और आर्थिक गलियारा
एनएच-927 परियोजना केवल एक सड़क निर्माण कार्य नहीं है, बल्कि यह भारत की क्षेत्रीय एकीकरण रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। 101.5 किलोमीटर लंबा यह प्रस्तावित हाईवे ‘हाइब्रिड वार्षिकी मोड’ (HAM) के तहत विकसित किया जा रहा है। यह एक ऐसा मॉडल है जिसमें सरकार और निजी डेवलपर वित्तीय जोखिमों को आपस में साझा करते हैं।
यह हाईवे बाराबंकी से शुरू होकर बहराइच के कृषि प्रधान क्षेत्रों से गुजरते हुए रूपईडीहा सीमा तक जाएगा। रूपईडीहा भारत और नेपाल के बीच व्यापार के लिए सबसे व्यस्त प्रवेश द्वारों में से एक है। वर्तमान में यह मार्ग संकरा और जर्जर है, जिससे नेपाल जाने वाले मालवाहक ट्रकों और आम यात्रियों को घंटों जाम और खराब सड़कों का सामना करना पड़ता है।
वन विभाग की आपत्ति: 9,000 पेड़ों का सवाल
वन विभाग ने इस परियोजना के लिए आवश्यक एनओसी देने से फिलहाल इनकार कर दिया है। विभाग का तर्क है कि हाईवे के वर्तमान नक्शे (Alignment) के अनुसार, लगभग 70 हेक्टेयर संरक्षित वन भूमि का उपयोग किया जाना है। इस प्रक्रिया में 9,000 से अधिक पुराने और विशाल पेड़ों को काटना पड़ेगा।
पर्यावरण अधिकारियों का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई से न केवल हरियाली कम होगी, बल्कि स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) पर भी बुरा असर पड़ेगा। वन (संरक्षण) अधिनियम के तहत, किसी भी गैर-वानिकी कार्य के लिए वन भूमि का उपयोग करने हेतु केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की मंजूरी अनिवार्य होती है। वन विभाग ने एनएचएआई को सुझाव दिया है कि वह संरक्षित क्षेत्रों को बचाने के लिए हाईवे का रास्ता बदल दे।
एनएचएआई का पक्ष: अलाइनमेंट बदलना असंभव क्यों?
एनएचएआई ने वन विभाग के सुझावों पर कड़ी आपत्ति जताई है। प्राधिकरण का कहना है कि मौजूदा अलाइनमेंट को अंतिम रूप देने से पहले व्यापक तकनीकी सर्वेक्षण किए गए थे और इसे प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) से भी मंजूरी मिल चुकी है।
एनएचएआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “इस स्तर पर अलाइनमेंट बदलना एक बड़ी आपदा साबित होगा। नया रास्ता न केवल परियोजना की लागत को ₹6,969 करोड़ से कहीं अधिक बढ़ा देगा, बल्कि यह घनी आबादी वाले क्षेत्रों से होकर गुजरेगा। इसके लिए सैकड़ों घरों और दुकानों को तोड़ना पड़ेगा, जिससे भारी सामाजिक असंतोष पैदा होगा और भूमि मुआवजे को लेकर कानूनी पेचीदगियां बढ़ जाएंगी।”
प्राधिकरण का यह भी तर्क है कि उन्होंने ‘प्रतिपूरक वनीकरण’ (Compensatory Afforestation) की योजना तैयार की है, जिसके तहत काटे गए हर एक पेड़ के बदले दस नए पेड़ लगाए जाएंगे। हालांकि, वन विभाग नए पौधों के जीवित रहने की दर और पुराने जंगलों की भरपाई को लेकर आशंकित है।
परियोजना का महत्व: नेपाल कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय विकास
इस हाईवे के निर्माण में देरी का सीधा असर उत्तर प्रदेश और भारत-नेपाल संबंधों के आर्थिक ढांचे पर पड़ रहा है।
भारत-नेपाल व्यापार: पश्चिमी नेपाल को होने वाले कुल निर्यात का लगभग 60% इसी मार्ग से गुजरता है। इस हाईवे के बनने से माल ढुलाई के समय में 40% तक की कमी आएगी, जिससे लॉजिस्टिक्स लागत कम होगी।
धार्मिक पर्यटन: यह मार्ग लुम्बिनी (भगवान बुद्ध की जन्मस्थली) और काठमांडू स्थित पशुपतिनाथ मंदिर जाने वाले तीर्थयात्रियों के लिए मुख्य रास्ता है। एक विश्वस्तरीय सड़क बनने से पर्यटन क्षेत्र को जबरदस्त बढ़ावा मिलेगा।
स्थानीय रोजगार: बाराबंकी और बहराइच जैसे जिले बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं। इस हाईवे के किनारे औद्योगिक केंद्र, कोल्ड स्टोरेज और वेयरहाउस बनने की उम्मीद है, जिससे हजारों स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा।
वर्तमान स्थिति और भविष्य की राह
मई 2026 तक की स्थिति के अनुसार, एनओसी का मामला अभी भी राज्य और केंद्र सरकार के बीच अटका हुआ है। यदि इस तिमाही के अंत तक कोई ठोस समाधान नहीं निकला, तो अक्टूबर 2026 में काम शुरू होने की संभावना न के बराबर है।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि इस गतिरोध को सुलझाने के लिए राज्य सरकार को हस्तक्षेप करना होगा। एक संभावित समाधान यह हो सकता है कि वन क्षेत्रों के ऊपर ‘एलिवेटेड कॉरिडोर’ (Elevated Corridor) का निर्माण किया जाए, जिससे पेड़ों की कटाई कम हो और वन्यजीवों का रास्ता भी प्रभावित न हो। हालांकि, इससे लागत में वृद्धि होना तय है।
एक नज़र में — परियोजना के मुख्य तथ्य
| विवरण | तथ्य |
| परियोजना का नाम | NH-927 बाराबंकी-बहराइच हाईवे |
| कुल लंबाई | 101.5 किलोमीटर |
| लेन क्षमता | 4/6 लेन एक्सेस-कंट्रोल्ड |
| कुल लागत | ₹6,969 करोड़ (HAM मोड) |
| विवाद का विषय | 70 हेक्टेयर वन भूमि और 9,000+ पेड़ |
| मुख्य उद्देश्य | नेपाल सीमा (रूपईडीहा) तक सीधी कनेक्टिविटी |
| काम शुरू होने का लक्ष्य | अक्टूबर 2026 (अनिश्चित) |




