झारखण्ड में अधमरी सी क्यों है वाम राजनीति !

लोकतंत्र में विपक्ष की बड़ी भूमिका होती है. वामपंथी पार्टियाँ ऐसे भी नैसर्गिक विपक्ष है, वो आम जन की राजनीति करती है . ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि आखिर झारखण्ड में वाम दलों का क्षितिज क्यों सिमट रहा है ! झारखंड में लेफ्ट के दो ही विधायक हैं.
आखिर क्यों?
सामाजिक असमानता की कहानियों से भरे इस प्रदेश में क्या वामपंथी पार्टियां सिकुड़ रही हैं.क्या इनका प्रभाव घट रहा हैं.आखिर कैसे इन दलों का विस्तार होगा. कैसे इनका जनाधार बढ़ेगा, इन्हीं सवालों पर रौशनी डालती यह रिपोर्ट.

झारखण्ड में वर्तमान में दो ही वामपंथी विधायक हैं. धनबाद के निरसा से मासस के अरूप चटर्जी और गिरिडीह के राजधनबार से माले के राजकुमार यादव. आखिर असमानता की कब्र पर पनपी झारखण्ड की राजनीति में वामपंथ की दाल क्यों नहीं गल रही ! क्यों पलामू, चतरा, हजारीबाग जैसे इलाके से लेफ्ट का एक भी विधायक नहीं है. भुवनेश्वर मेहता की हार के बाद सीपीआई का खाता तक नहीं खुला. क्यों लाल सलाम की वह गर्जना अब कम सुनायी देती है, जो बड़े बड़े माफियाओं को रास्ता बदलने पर मजबूर कर देती थी. क्या झारखण्ड के सन्दर्भ में लाल झंडा तेज़ी से अप्रासंगिक होता जा रहा है. ऐसे कई सवाल हैं जो लेफ्ट पॉलिटिक्स की व्याख्या को नए सिरे से समझने की और संकेत करते हैं.
नक्सलियों के प्रभाव वाले जिलों में वामपंथी दल सबसे कमजोर हैसियत में हैं. वाम चिन्तक कहते हैं शायद नक्सली वामपंथियों को ही सबसे पहले कमजोर कर रहे हैं. नक्सलियों के गढ़ में भाजपा जीत जाती है लेकिन उन्हें लगता है कि अगर कोई वामपंथी जीत गया तो फिर जनता उनकी बात नहीं सुनेगी. झारखण्ड के सबसे बड़े लेफ्ट लीडर महेंद्र सिंह की हत्या नक्सलियों ने ही की, क्योंकि वह नक्सली दमन की भी उतनी ही मुखर आलोचना करते थे. ऐसे में नक्सली नेताओं को लगने लगता है कि ये तो जनता का आदमी है. जनता से इनका सीधा सम्वाद है, ऐसे में उनकी दादागीरी इलाके में नहीं चलेगी. इसलिए नक्सल प्रभाव वाले इलाके में वाम दलों की हालत शायद सबसे खस्ता है.
तीसरा एक प्रमुख कारण है खर्चीला चुनाव. लेफ्ट पार्टियां काडर बेस्ड होती हैं, उनके पास इतनी पूंजी नहीं नहीं होती, ना ही लेफ्ट के उम्मीदवारों को भाजपा या कांग्रेस की तरह चुनाव लड़ने के लिए पैसा मिलता है. लेफ्ट के कार्यकर्ता आम लोगों से चंदा लेते हैं, उसी बल पर चुनाव की तैयारी करते हैं. नतीजा यह होता है कि लेफ्ट पार्टी बूथ मैनेजमेंट का खर्च तक नहीं जुटा पाती. अगर आज आपके पास करोड़ों नहीं है तो आप चुनाव लड़ने के लिए जरुरी संसाधन नहीं जुटा सकते. ना ही चुनाव कार्यालय चला सकते. वाम दलों की हार का एक बड़ा कारण उनकी संसाधनहीनता भी है.
आज की राजनीति में वोटर भी प्रलोभन के शिकार होते हैं. केश फॉर वोट के कई मामले प्रकाश में आ चुके हैं. अब लोगों को शायद दल के आदर्श या आइडियोलॉजी से कोई मतलब नहीं रहा, उन्हें बस जातीय और धन बल के संतुलन का बाज़ीगर उम्मीदवार चाहिए. ऐसे वोटर भी वाम दलों को समेटने के दोषी हैं. वाम दल के नेता जातीय आधार पर वोट नहीं मांग सकते, वो समानता की बात के आधार पर मतदाताओं का समर्थन मांगते हैं . जातीय टुकड़ों में बंटा झारखण्ड का समाज अपने जातीय नायक को ही आखिर में वोट देता है.
ऐसे में क्या है वामपंथ के लिए रास्ता ! क्या वाम दलों का मर्सिया पढ़ देना चाहिए ! इसपर माले के पूर्व विधायक विनोद सिंह कहते हैं कि रास्ता जन आन्दोलन के बीच से ही निकलेगा. वाम दलों के नेताओं को जनता से सरोकारी रिश्ते रखने होंगे . लगातार जन आन्दोलन करना होगा. लोगों को जागरूक करना होगा. वाम नेताओं को विश्वसनीय बनना होगा . जब जनता अपने नेता पर भरोसा करती है, तभी उनकी सुनती है.
युवा भी लेफ्ट से ज्यादा नहीं जुड़ रहे हैं. लेफ्ट नेताओं को कॉलेज में जा जा कर उन्हें आइडियोलॉजी बेस्ड पॉलिटिक्स से जोड़ना होगा. जब बड़ी तादाद में युवा किसी विचार से जुड़ेंगे, तभी वाम दलों को उनकी खोयी जमीन मिल पायेगी. झारखण्ड जैसे प्रदेश में अभी भी वाम दलों के लिए काफी गुंजाईश है.

 

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