न सरकार की अदा बदली न विपक्ष का इरादा

झारखंड विधानसभा के बजट सत्र में आगे क्या होगा इसकी एक झलक आज विधानसभा परिसर में दिखाई दी। शीतकालीन सत्र हो या इससे पूर्व के सत्र हों, विपक्ष लगातार सरकार के फैसलों को लेकर सवाल उठा रहा है, भूमि अधिग्रहण बिल, स्थानीय नीति से लेकर मोमेंटम झारखंड आयोजन में हुई गड़बड़ी के बहाने वह हमलावर है। ताजा मामला सरकार के शीर्ष अधिकारियों से जुड़ा है। राज्य की सीएस, डीजीपी और एडीजी को हटाने और बर्खास्त करने की मांग को लेकर विपक्षी दलों के विधायकों ने विधानसभा के बाहर जोरदार हंगामा किया। विपक्ष के नेता हेमंत सोरेन और अन्य विपक्षी विधायक हाथ में तख्ती लिए खड़े थे। सरकार द्वारा भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने की बात कह रहे थे।

देखा जाय तो इस पूरे मामले में विपक्ष रघुवर सरकार को नैतिकता के सवाल पर जनता के बीच एक्सपोज करना चाहता है, ताकि सरकार की कार्यशैली को कटघरे में खड़ा कर उसे भ्रष्टाचार में लिप्त दिखाया जा सके। विपक्ष जहां एक ओर सरकार से अपनी मांगों को मनवाने के लिए अड़ियल रवैया अपनाए हुए है वहीं दूसरी ओर सरकार ने भी यह तय कर लिया है कि वह झूकने वाली नहीं है। इसलिए वह विपक्ष के आरोपों का जवाब तकनीकी स्तर पर दे रही है। कम से कम सीएस राजबाला वर्मा के मामले में तो वह कुछ ऐसी ही स्ट्रैटजी पर काम करती दिख रही है।

इन सब के बीच विधानसभा अध्यक्ष दिनेश उरांव वाले प्रकरण ने पूरे मामले को नया ट्विस्ट देकर इसे ट्राइंगल का शक्ल दे दिया है, और सरकार को अब इस झंझावात से उबरने के लिए तीन स्तरों पर काम करना पड़ रहा है। सियासी जानकारों की मानें तो मिशन 2019 में जुटी सत्तासीन पार्टी अगर इन्हीं झमेलों को सुलझाने में जुटी रही और ग्राउंड पर कुछ बड़ा डिलेवर नहीं कर पाई तो इसका सीधा फायदा विपक्ष को होगा। जानकारों के अनुसार विपक्ष के सियासी खेल में सरकार पूरी तरह फंस चुकी है जिसकी हामी बीजेपी के कई वरिष्ठ नेता भी भर रहे हैं। अब देखना दिलचस्प होगा कि सरकार या पार्टी के स्तर पर इस समस्या से निपटने के लिए अंततः क्या निर्णय लिया जाता है।

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