बिहारी राजनीति का उपेन्द्र कुशवाहा फैक्टर

बिहार की राजनीति में उपेन्द्र कुशवाहा और उनकी रालोसपा इन दिनों केन्द्रीय धुरी बने हुए हैं. तकरीबन 8 फीसदी कोइरी वोटबैंक के सबसे बड़े नेता होने के चलते हर दल इनके साथ सियासी गलबहियां करना चाहता है. कुशवाहा समूह का हर बड़ा नेता चाहे वो नागमणि हों या भगवान् सिंह कुशवाहा सब उपेन्द्र कुशवाहा के रालोसपा के हिस्से बन चुके हैं. तमाम कुशवाहा नेताओं के एक झंडे के अंदर आने की वज़ह से नीतीश कुमार का लव-कुश समीकरण भी तेज़ी से दरकने लगा है. लेकिन नीतीश और मोदी की नयी दोस्ती के चलते भाजपा नीतीश को कुछ ज्यादा ही भाव दे रही है. भाजपा के इस अंधे नीतीश प्रेम की वज़ह से बिहार के कुशवाहा वोटबैंक में बेचैनी है, असहजता है.

कांग्रेस और राजद इसी बेचैनी को हर हाल में भुनाना चाहता है. कांग्रेस आलाकमान जानता है कि अगर बिहार के सजग कुशवाहा वोटों और लालू के यादव वोटों के साथ मुस्लिम वोटर एक साथ आ गए तो चुनाव में आशातीत सफलता पाई जा सकती है.

इसी समीकरण को ध्यान में रखकर कांग्रेस रालोसपा से नजदीकी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. अभी तो कुशवाहा एनडीए के साथ हैं और कांग्रेस की पहल का कोई जवाब नहीं दे रहे हैं पर जानकार बताते हैं कि अगर भाजपा ने यूँ ही रालोसपा को कमतर आंकने की गलती जारी रखी तो रालोसपा के आधार वर्ग का दबाव बढ़ता जायेगा.

अपने आधार वोट बैंक की इसी चिंता को ध्यान में रखते हुएहाल ही में कुशवाहा एक बड़ी रैली के जरिये अपनी शक्ति और लोकप्रियता की झलक दिखाना चाहते हैं साथ ही एक क्लियर पोलिटिकल मेसेज भी देना चाहते हैं. मेसेज साफ़-साफ़....इतने बड़े मास लीडर की उपेक्षा क्यों!

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