राजनीति में लालू के उत्तराधिकारी

-बदले-बदले से तेजस्वी

क्रिकेट की पिच के बाद जब से तेजस्वी ने अपने पिता की राजनैतिक विरासत को आगे बढ़ाने का फैसला किया, तभी से उन्होंने पार्टी के अंदर बदलाव की नींव डाल दी। आम तौर पर सोशल मीडिया से दूरी रखने वाली पार्टी RJD तेजस्वी के आने के बाद से सोशल मीडिया पर काफी आक्रामक तरीके से नजर आने लगी। ‘ये आईटी-वाईटी क्या होता है..’ कभी ये कहकर लालू प्रसाद विपक्षी दलों की खिल्ली उड़ाया करते थे। लेकिन 2015 में चुनाव से पहले विपक्षियों पर काउंटर अटैक करने के लिए आरजेडी की सोशल मीडिया क्विक रिस्पॉन्स टीम बनी और इसकी जिम्मेदारी तेजस्वी को ही सौंपी। तेजस्वी की रणनीति का ही नतीजा रहा कि लालू भी हर बात फेसबुक, ट्विटर के जरिए लगातार रखने लगे। विपक्षियों पर निशाना साधने लगे। तेजस्वी यादव ने उप मुख्यमंत्री का पदभार संभालने के बाद भी कुछ बेहतर प्रयोग कर अपनी राजनैतिक जमीन बनाने की कोशिश की, हालांकि नीतीश और लालू यादव जैसे बड़े नेताओं की मौजूदगी में तेजस्वी पर लोगों ने कम ही ध्यान दिया। अब जबकि सत्ता जाने के बाद तेजस्वी विपक्ष के नेता बन गए हैं, तो यह उन्हें खुद को साबित करने का एक मौका भी है।

नीतीश कुमार ने जब तेजस्वी को कारण बता महागठबंधन से अपना पल्ला झाड़ा, लगता है इस बात ने तेजस्वी में नयी जान फूंक दी है। तेजस्वी सदन के अलावा सोशल मीडिया पर भी नीतीश को घेरने में लगे हैं। तेजस्वी का ये रूप जरूर लालू के लिए राहत की बात हो सकती है। तेजस्वी जब बिहार विधानसभा में नीतीश को घेर रहे थे, तो तेजस्वी के तेवर देखने लायक थी। तेजस्वी ने जिस मंझे हुए अंदाज में नीतीश को घेरा उससे एक नेता के गुण साफ तौर पर उनमें देखे जा सकते थे। विधानसभा में नेता विपक्ष घोषित किए जाने के बाद तेजस्वी ने करीब 41 मिनट का भाषण दिया। विपक्ष के नेता के तौर पर सदन में ये उनका पहला भाषण था।

एक तरफ लालू यादव खुद केस और जांच के घेरे में फंसकर कमजोर पड़ते जा रहे हैं और ऐसे समय में नीतीश भी लालू का साथ छोड़ वापस भाजपा में चले गए, तो यह लालू के साथ उनकी पार्टी के लिए काफी मुश्किल दौर है। मगर तेजस्वी के तेवर लालू के लिए राहत की बात हो सकती है।

हालांकि तेजस्वी के लिए आने वाला समय काफी चुनौतीपूर्ण है। असली टेस्ट अब शुरू हुआ है। एक तरफ वो खुद आरोपों से घिरे हैं, तो वहीं उनके परिवार के लोगों पर भी कई तरह के आरोप लगे हैं। तेजस्वी पर लालू यादव के राजनीतिक विरासत को भी आगे बढ़ाने का दरोमदार होगा। ऐसे में तेजस्वी से उम्मीद होगी कि वो अपने पारिवारिक उलझनों को सुलझाने के साथ ही विपक्ष के नेता के रूप में भी अपनी एक अलग छवि गढ़ें। एक ऐसी छवि जो आने वाले समय में बिहार की राजनीति में एक भरोसेमंद चेहरे के रूप में हो। पार्टी को संभालने और बाहरी तत्वों से मुकाबला करते हुए बैलेंस करना तेजस्वी यादव के लिए बेशक एक बड़ी चुनौती होगी।

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