झारखंड में अखाड़े की राजनीति भाग 1

-मनोज कुमार सिंह-
राजनीति गुरु डॉट कॉम द्वारा 12 फरवरी 2018 और उसके पहले भी यह आशंका जताई गई थी कि झारखंड में अखाड़े की राजनीति की शुरुआत हो चुकी है। इसके पहले कि हम यह जानें कि ये अखाड़े की राजनीति है क्या?

आइए, इसे समझने के लिए हम झारखंड के भौगोलिक और राजनीतिक इतिहास के बारे में पड़ताल करें ,तो ये समझना थोड़ा सहज होगा। दरअसल, झारखंड के पांचों प्रमंडलों में शुरू से ही अलग-अलग राजनीतिक अखाड़ा अपना स्वरूप लेने लगा था और हर प्रमंडल में अलग-अलग नेताओं का अपना जातीय समीकरण के आधार पर जीत का फार्मूला भी बनता रहा है। लेकिन वर्तमान में झारखंड के मूलवासियों के बीच एक खाई बनती नजर आ रही है ,जब से झारखंड के 22 परसेंट कुर्मी अपने को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे हैं और तेजी से बड़े- बड़े आंदोलन खड़े कर रहे हैं ।

इससे यहां के 26 परसेंट अनुसूचित जनजाति की आबादी को यह आशंका होने लगी है कि यदि सरकार ने कुर्मी जाति के बढ़ते दबाव के कारण उन्हें एसटी का दर्जा दे दिया तो हमारी हकमारी हो जाएगी और इसी वजह से वह भी संगठित होकर सड़कों पर उतर गए हैं ।कल रांची जिला के अनगड़ा प्रखंड में भारी संख्या में आदिवासी समाज का जमावड़ा हुआ था ,कार्यक्रम का आयोजन केंद्रीय सरना समाज उत्थान समिति द्वारा किया गया था, जिसमें एक साथ उन 42 विधायकों एवं सांसदों ,जिन्होंने कुर्मी को एसटी का दर्जा देने संबंधित पत्र सरकार को लिखा था ,का पुतला दहन किया गया।

यहां यह समझना जरूरी है कि क्या वास्तव में मुद्दों पर समाज आगे बढ़ रहा है या फिर झारखंड में बरसों से एक साथ रहने वाले मूलवासी के बीच दरार पैदा करने की कोई साजिश चल रही है। साजिश की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि इस प्रकार की गोलबंदी से कुछ सीमित राजनेताओं को अपना फायदा तो हो ही जाएगा लेकिन राज्य हित में यह अखाड़े की राजनीति का अंत बहुत विभत्स होगा । दोनों मूलवासियों के बीच हो रही गोलबंदी के पीछे कौन सा षडयंत्र काम कर रहा है ,इसका पर्दाफाश भी होना आवश्यक है ।

सवाल अखाड़े की राजनीति के परिणाम को लेकर नहीं है, सवाल तो यह है कि वास्तविक हकमारी वाला वर्ग अभी भी चुपचाप तमाशा देख रहा है ।जबकि उसकी गोलबंदी का आकार अपने वास्तविक स्वरुप में आ जाएगा तो शायद एक नया राजनीतिक समीकरण उठ खड़ा हो ।इस अखाड़े की राजनीति में अच्छी बात यह है कि अभी तक कोई राजनीतिक दल खुलकर मंच पर नहीं आया है ,लेकिन समाज के बढ़ते दबाव एवं हो रही गोलबंदी नेताओं को अपनी और ना खींचे ऐसा हो नहीं सकता। इस गोलबंदी से सबसे ज्यादा नुकसान झामुमो और उन झारखंड नामधारी पार्टियों को होगा जो मूलवासी महतो ,मांझी और मुस्लिम के गठजोड़ से सत्ता का मजा लेते रहे हैं।

यदि अखाड़े की राजनीति के दूसरे पहलू को तलाशा जाए तो एक तस्वीर यह भी साफ- साफ दिखती है कि इन दो बड़े मूलवासी आबादी वाली जातियों को राजनीतिक रूप से नजरअंदाज करना किसी भी राजनीतिक दल के बस के बाहर है ।फिर भी सामाजिक चिंतक यह मानते हैं कि राज्य हित में बढ़ रही इस गोलबंदी को रोकना आवश्यक है ।किसी भी जाति को यह ना लगे कि उसकी हकमारी हो रही है और सहजता से उनके बीच सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास भी राजनीतिज्ञों को करना ही पड़ेगा ।
वैसे षडयंत्र और साजिश करने वाले लोगों की पहचान कर समाज के सामने उनकी असलियत को उजागर करना ही पड़ेगा, जो आसान नहीं दिख रहा है ।पार्टियां तो सियासी तावे के गर्म होने और उस पर रोटी सेंक कर निवाला बनाने "के फार्मूले की तरफ नजरें गड़ाई हुई हैं ।अब देखना यह है कि भविष्य में किस अखाड़े पर कितनी रोटी सेंकी जा सकती है. क्रमशः..........

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