गांधी के बिखरते विरासत पर सियासत

राकेश कुमार

चम्पारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष पर गांधीवाद और गांधी को सभी राजनीतिज्ञों और गांधीवादियों के जुबान पर है। हर मंच से गांधी दर्शन पर भाषण दिया जा रहा है। लेकिन गांधी के नाम पर राजनीति करने वालों ने गांधी जी के विरासत को संभालने की जहमत नहीं उठाई। गांधी जी की स्मृतियां धूमिल होती जा रही है। ऐसे में कुछ गैर राजनीतिक संगठनों द्वारा गांधी के विचारों को यथासंभव फैलाने की मुहिम शुरू की गई है।

पत्रकारों ने पहल की सत्याग्रह शताब्दी वर्ष समारोह की
10 अप्रैल 1917 को मोहन दास करमचंद गांधी बिहार की राजधानी पटना पहुंचे थे और 15 अप्रैल 1917 को मुजफ्फरपुर होते हुये चम्पारण की धरती पर पहली बार कदम रखे थे। यहां उन्होंने किसानों की समस्याओं को सुना और जाना। 17 अप्रैल को जसौली पट्टी बाबू लोमराज सिंह के यहां जा रहे थे कि रास्ते में चन्द्रहिया में अंग्रेज सरकार का फरमान मिला और उन्हें वापस मोतिहारी लौटना पड़ा और यहीं से सत्याग्रह का बीजारोपण हुआ। अंग्रेज सरकार के मोतिहारी को छोड़कर चले जाने के आदेश को उन्होंने मानने से आग्रहपूर्वक मना कर दिया। लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि गांधी जी के चम्पारण सत्याग्रह के सौवें वर्षगांठ पर किसी भी कार्यक्रम का आयोजन केन्द्र व राज्य सरकार या गांधी जी के नाम पर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकनेवाली राजनीतिक पार्टियों ने नहीं किया था। यह अचंभित करने वाला विषय था। शताब्दी वर्ष पर गांधी को याद करने वाला भी कोई नजर नहीं आ रहा था। ऐसे में प्रखर गांधीवादी और वरिष्ठ पत्रकार चन्द्रभूषण पाण्डेय के नेतृत्व में चम्पारण प्रेस क्लब ने 10 अप्रैल को बुद्धिजीवियों की एक सेमीनार का आयोजन किया। विषय था ‘‘ वर्तमान परिवेश में गांधी के विचारों का प्रासंगिकता’’। सेमीनार में मुख्य अतिथि एवं वक्ता के रूप में बिहार विधानसभा के अध्यक्ष विजय कुमार चौधरी ने भाग लिया। मंच से हीं उन्होंने चम्पारण प्रेस क्लब के इस कदम को सराहनीय बताते हुये कहा कि गांधी जी के विचारों को देश-दुनियां में फेलाने का बीडा पत्रकारों ने उठाया है। इससे प्रेरणा लेनी चाहिये। इसके बाद कुछ स्वंयसेवी संगठनों ने कार्यक्रम आयोजित किया। इसके बाद सत्याग्रह या गांधी जी से जुडा कोई महत्वपूर्ण कार्यक्रम आयोजित नहीं किया गया। लेकिन चम्पारण प्रेस क्लब के इस कार्यक्रम ने पटना और दिल्ली तक एक महत्वपूर्ण संदेश अवश्य पहुंचाया। स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने पहल की और चम्पारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष समारोह मनाने का निर्णय हुआ।

विशेष मौके पर ही याद आते है गांधी
गांधी जी के नाम पर अपनी ब्रांडिंग करने वाले नेताओं को गांधी जी की याद विशेष मौके पर हीं आती रही है। गांधी जयंती, पूण्यतिथि, स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस। अमूमन यही तिथियां हैं जब बापू की याद राजनीतिज्ञों को आती रही है। सरकारों और दलों ने भी अपना अभियान भितिहरवा आश्रम से शुरू करने की परम्परा बना ली है, लेकिन बापू के उस विरासत भितिहरवा आश्रम और उस क्षेत्र के विकास के लिये कभी कोई बड़ी योजना पर काम नहीं हो सका। एकमात्र राजनेता थे भूतपूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर, जिन्होंने क्षेत्र के विकास के लिये लम्बे समय तक व्यक्तिगत पहल की। 13 वर्षों तक बापू के पूण्यतिथि पर चन्द्रशेखर भितिहरवा जाते रहे। इस क्रम में मोतिहारी के कुछ नेता और बुद्धिजीवी भी उनके अभियान से जुड़े रहे। इस संदर्भ में गांधी दर्शन से जुड़े चन्द्रभूषण पाण्डेय बताते हैं कि चन्द्रशेखर मोतिहारी में बैठक कर व्यक्तिगत रूप से चंदा इकट्ठा कर भितिहरवा के विकास के लिये प्रयासरत रहे। उनके आगमन को लेकर आनन-फानन में राज्य सरकार सड़क निर्माण कराती रही जो साल भर में पुनः टूट जाता था। हालांकि राज्य सरकार ने भी कुछ योजनाओं को प्रारंभ किया था परन्तु कुछ भी धरातल पर नहीं दिखता है। माता ‘‘बा’’ के नाम पर कस्तूरबा कन्या विद्यालय खोला गया जो कुव्यवस्था का शिकार है और उसका वांच्छित लाभ नहीं मिल रहा है। जबकि लगभग सभी बड़े नेता भितिहरवा जा चुके हैं।

केवल भितिहरवा हीं नहीं गांधी जी के प्रथम पाठशाला बडहरवा लखनसेन की भी हालत ऐसी हीं है। ज्ञात हो कि गांधी जी ने 14 नवम्बर 1918 को बडहरवा लखनसेन में बेसिक स्कूल की स्थापना की थी। स्थानीय रामलाल बक्सी नामक किसान ने विद्यालय के लिये जमीन और भवन दान में दिया था। इस स्कूल में बा रहकर बच्चों को पढ़ाती थी और स्वच्छता का पाठ भी पढ़ाती थी। जिस खपडें के मकान में बा रहती थी उसे भी हटा दिया गया। चम्पारण के ढाका प्रखण्ड से महज 8 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित बड़हरवा लखनसेन स्थित बापू के प्रथम बेसिक विद्यालय के भग्नावशेष को भी संभाल के नहीं रखा जा सका। उसी जगह एक प्राईमरी विधालय चलता है जिसे हाई स्कूल के रूप में उत्क्रमित किया गया है। महज खानापूर्ति के लिये एक गांधीजी की प्रतिमा स्थापित की गई है। उक्त मूर्ति का अनावरण गांधी जी के पौत्र राजगोपाल गांधी ने किया था। जबकि यहां पर वह चरखा भी था जिसे गांधी जी और उनके बाद बा चलाती थी। जो विधालय के स्टोर में सड़-गल रहा था। तकरीबन 5 साल पहले आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर और प्रभात खबर के बिहार सम्पादक स्वयंप्रकाश बड़हरवा लखनसेन आये थे तो इस बात को लेकर विद्यालय प्रबंधन को फटकार लगाते हुये उसे विरासत बताते हुये संयोकर रखने की सलाह दी थी।
वहीं 17 जनवरी 1918 को गांधी जी ने मधुबन में तीसरा बेसिक स्कूल की स्थापना की थी। स्कूल कुछ वर्षों तक चला। स्कूल के लिये मारवाड़ियों ने भूमि दी थी। स्थानीय वयोवृद्ध के अनुसार स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद स्कूल बन्द कर दिया गया और उसी में काग्रेस का कार्यालय बना दिया गया। काग्रेस के नेताओं ने हीं गांधी जी के तीसरे बेसिक स्कूल को हड़प लिया। आज भी वहां कांग्रेस का कार्यालय है।

कुल मिला के चम्पारण भले हीं गांधी जी के सत्याग्रह की प्रयोगस्थली रही हो परन्तु सत्ता में बैठे किसी ने भी उसको संजोने का कारगर प्रयास नहीं किया। 2000 के दशक में तत्कालीन जिलाधिकारी अरूण कुमार और उनके बाद चंचल कुमार के समय में गांधी संग्रहालय एवं स्मारक का निर्माण कराया गया। गांधी स्मारक के तत्कालीन सचिव चन्द्रभूषण पाण्डेय के अथक प्रयास के बाद स्मारक बनकर तैयार हुआ । उसी प्रकार चन्द्रहिया में भी गांधी स्मारक के भूमि का अतिक्रमण हो गया था जिसे तत्कालीन डीएम नर्मदेश्वर लाल ने मुक्त कराकर चहारदिवारी का निर्माण कराया। कुल मिला कर कहा जा सकता है कि सभी ने गांधी जी को पुष्पांजली तो दी पर कार्यांजली किसी ने नहीं दी।

शताब्दी वर्ष पर भी कार्यक्रम हो रहे हैं और होने हैं। नितिश कुमार ने शताब्दी वर्ष समारोह के तहत 18 अप्रैल को चन्द्रहिया से मोतिहारी गांधी उद्यान तक लगभग 8 किलोमीटर की पैदल यात्रा की। खूब जमकर लोगों ने भाग लिया, लेकिन भाग लेने वालों में ज्यादातर वही थे जो मुख्यमंत्री को अपना चेहरा दिखाना चाहते थे। जो गांधी भक्त थे वे काफिले में पीछे गुम हो गये थे। पैदल यात्रा के बाद एक आम सभा का भी आयोजन किया गया। भव्य पंडाल और भारी व्यवस्था के बीच मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने भाषण दिया। उपस्थित लोगों, जिनमें ज्यादातर प्रशासन द्वारा बुलाये और लाये गये थे, वे भाषण सुनकर अपनी ड्यूटी भर पूरी की। परन्तु इस आयोजन का कोई लाभ क्षेत्र को या गांधी से जुड़े विरासत को नहीं मिला। हालांकि राज्य सरकार अक्टूबर माह में एक बड़ा आयोजन मोतिहारी में करने वाली है। राज्य सरकार द्वारा राजधानी पटना में कई कार्यक्रम किये गये। संगोष्ठियां हुई। पूरे राज्य में पेनोरोमा के तहत गांधी जी से जुडी फिल्में दिखाई गई।
महात्मा गांधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा कुलपति डॉ. अरविन्द अग्रवाल के नेतृत्व में रन फॉर चम्पारण का आयोजन किया गया।

वहीं स्थानीय सांसद सह केन्द्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह के नेतृत्व में भी सत्याग्रह शताब्दी वर्ष समारोह 13 से 19 अप्रैल तक मनाया गया। राज्य सरकार और केन्द्र सरकार के कार्यक्रम में कोई तालमेल नजर नहीं आया। हांलाकि पहली बार मंत्री राधामोहन सिंह द्वारा मोतिहारी में जिले के सभी स्वतंत्रता सेनानियों और उनके उत्तराधिकारियों को सम्मानित किया गया। इस सात दिवसीय कार्यक्रम में कई तरह के आयोजन किये गये जिनका लाभ स्थानीय लोगों को मिला। इस दौरान कृषि मेला, कौशल विकास, रोजगार मेला, खादी मेला, पूसा कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा किसानों को नई तकनीक और परामर्श, बागवानी मिशन और कोआपरेटिव द्वारा मेला लगाया गया। युवाओं को रोजगार हेतु कई तरह के प्रशिक्षण दिये गये और रोजगार मेला में आई कई कंपनियों ने सैकड़ों युवाओं को चयनित कर रोजगार मुहैया कराई। उक्त अवसर पर केन्द्रीय मंत्री राजीव प्रताप रूढी, अनन्त कुमार के अलावे पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी, सुशील मोदी और राम कृपाल यादव भी आये थे। वहीं गांधी जी की पौत्री तारा गांधी सहित कई गांधीवादी आये थे।

तारा गांधी ने चन्द्रहिया में महिलाओं की सभा में भी भाग ली। वहां की ग्रामीण महिलाओं ने उन्हें छूकर देख रहीं थी की आखिर बापू की पोती कैसी हैं। भाव विभोर तारा गांधी की आंखें नम हो गई और उन्होंने कहा कि हममें बापू जैसा कुछ भी नहीं, मैं आप जैसी हुं। आप लोग महान हैं जो गांधी जी को दिल में आज भी जिन्दा रखी हैं।

चन्द्रहिया गांव में 99 फिसदी पिछड़े, दलित और मुस्लिम जाति के लोग रहते हैं। एक प्राथमिक विद्यालय था। पूर्व में यहां की महिलायें खादी ग्रामोद्योग के द्वारा संचालित कार्य करती थीं। चरखा चलाती थी। सूत काटती थी। कम्बल बुनने का काम करती थीं और रंगाई का काम करती थी। यहीं उनकी जीविका थी पर 1970 के दशक में खादी ग्रामोद्योग का यह कार्यक्रम भी बन्द हो गया।
सत्याग्रह शताब्दी वर्ष पर सांसद राधा मोहन सिंह ने चन्द्रहियां को गोद लिया है। इसके बाद से चन्द्रहिया में विकास के कई कार्य हुये। सोलर लैम्प से रौशनी की व्यवस्था की गई है। हर धर में गैस का कनेक्सन दिया गया है। विद्युतिकरण कराई गई है। घर-घर जल कार्यक्रम के तहत पेय जल की व्यवस्था कराई जा रही है। हर घर में शौचालय की व्यव्स्था हो रही है।

गांधी जी के सहयोगियों के परिजन हैं लाचार
पर आज भी इसे विडम्बना हीं कहेंगे की गांधी जी के साथ उनके आन्दोलन में भाग लेने वाला और अंग्रेजों की गोली से शहीद हुआ चन्द्रहिया निवासी भिखारी राय के परिजनों की स्थिति आज भी दयनीय बनी हुई है। गांधी जी के चम्पारण आगमन पर चन्द्रहिया का भिखारी राय उनका अन्धभक्त बन गया। गांधी जी के आन्दोलन में सदा सहयोगी के रूप में रहा। 1942 में आन्दोलन के दौरान प्रजापति आश्रम में गोली बारी हुई और भिखारी राय की मौत अंग्रेजों के गोली से हो गई। आजादी मिली लेकिन शहीद भिखारी राय के परिजनों को स्वतंत्रता सेनानी और उत्तराधिकारी आदि की कोई जानकारी नहीं थी। अनपढ़ गरीब दो जून राटी की जुगत में हीं दिन गुजार रहे थे। इसकी जानकारी मिलने पर गांधी स्मारक के सचिव चन्द्रभूषण पाण्डेय ने बहुत प्रयास किया कि परिजनों को लाभ दिलायी जा सके, लेकिन विफल रहे।

पुन: 8 और 9 जुलाई को चम्पारण प्रेस क्लाब द्वारा एक सेमिनार का आयोजन किया गया। जिसमें देश के हर प्रान्त से पत्रकारों ने भाग लिया। मुख्य वक्ता के रूप में प्रख्यात पत्रकार संतोष भारतीय, एशिया टीवी के राजीव मिश्र, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रध्यापक और लेखक आनन्द वर्धन थे। उक्त समारोह में केन्द्रीय मंत्री राधामोहन सिंह और बिहार विधान सभा के अघ्यक्ष विजय कुमार चौधरी बतौर मु़ख्य अतिथि विराजमान थे। राधाकृष्ण सिकारिया बीएड कॉलेज में आयोजित सेमिनार के मंच से वरिष्ठ पत्रकार संतोष भारतीय ने यह प्रश्न उठाया कि गांधी जी ने जिन क्षेत्रों को चुना था, इस मौके पर उसके विकास के लिये क्या किया गया। उन्होंने विधान सभाध्यक्ष के माध्यम से सरकार को भी संदेश दिया कि उन क्षेत्रों में गांधी जी के विचारों के अनुरूप शिक्षा, स्वास्थ, सफाई आदी मूल जरूरतों पर काम करना चाहिये और उनके विचारों को प्रचारित प्रशारित करना चाहिये। सेमिनार का उद्देश्य भी यही था कि देश भर के पत्रकारों तक गांधी के सत्याग्रह की प्रयोगस्थली को नजदीक से देखने और समझने के मौका मिले। सभी अतिथियों ने गांधी जी से जुड़े स्थलों के विकास की जरूरत महसूस की।

बहरहाल, इतना ही कहा जा सकता है कि गांधी जी को केवल याद हीं किया गया उनके विचारों को याद नहीं किया गया। गांधी जी के विचार केवल भाषणों तक हीं सीमित रह गये। जबकि अगर गांधी जी के विरासत को संभाला गया होता और इसका विकास किया जाता तो चम्पारण विश्व स्तर पर गांधीवादियों के लिये धर्मस्थल और सैलानियों के लिये पर्यटक स्थल बन जाता।

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