बिहार का संदेश साफ है

उपचुनाव के नतीजे ने बिहार के संदेश को बेहद साफ कर दिया है. राजनीति के जानकार अपने-अपने हिसाब से इसका मतलब निकाल रहे हैं, लेकिन जनता ने अपना मतलब बता दिया है. सीमांचल के अररिया और दक्षिण मध्य बिहार के जहानाबाद में राजद की जीत उन लोगों के मुंह पर तमाचा है, जो लालू प्रसाद के जेल जाने के बाद राजद का मरसिया पढ़ रहे थे. राजद ने ना केवल जहानाबाद सीट को अपने पास रखा बल्कि अररिया को भी बरकरार रखा. भभुआ में कांग्रेस का उम्मीदवार था, वहां राजद का वोट कांग्रेस को पूरी तरह ट्रांसफर नहीं हो पाया. अन्यथा जीत की हैट्रिक लग जाती बिहार में.

बिहार का नतीजा बेहद खास है. नीतीश कुमार के लिए बेहद खास संदेश है. राजद और जदयू गठबंधन टूटने के बाद यह पहला चुनाव था. तो क्या यह माना जाए कि नीतीश के विकास मॉडल को जनता ने ठुकरा दिया है या यह माना जाए कि राजद के जाति समीकरण की जीत हुई है! दोनों ही निष्कर्ष सच नहीं होंगे. लोगों ने जातीय समीकरण को भी चुना है और वर्तमान सरकार के आधे अधूरे विकास मॉडल को भी नकारा है. बिहार में विकास का मतलब सड़क और पुल से रह गया है. जबकि लोगों ने जाति समीकरण और वर्तमान सरकार के आधे अधूरे विकास मॉडल को भी नकारा है.

जबकि विकास का मतलब हर जाति को, हर धर्म को साथ लेकर चलने से है. सब को संतुष्ट करने से है. लेकिन अहंकार में डूबी सरकारी मशीनरी लोगों की सुनी नहीं रही है. अभी भी प्रदेश में बालू के लिए हाहाकार है राजद समर्थित कुछ नेताओं की वजह से बालू के पूरे नेटवर्क को ही सरकार ने जाम कर दिया है. ऐसी गलतियों से सबक लेने की जरूरत है, अन्यथा आने वाले चुनाव में जनता का मैंडेट बदल सकता है. जदयू के बयान बहादुर जिस भाषा का प्रयोग करते हैं, उस भाषा से राजद का युवा नेतृत्व और मजबूत ही होगा. बयानों में संयम रखना तो नीतीश कुमार की राजनीतिक शैली है फिर उनके दल के सूरमा ऐसा क्यों नहीं कर पा रहे. ऐसी कई बातें हैं जिनका ख्याल रखकर ही आगे की राजनीति की जाए तो बेहतर है.

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