अलग झारखंड राज्य के लिए बेसरा ने छोड़ दी थी विधायकी!

उदय कुमार चौहान

झारखंड के कई सियासी सूरमा कभी राजनीति के सूर्य थे, चमकते थे, उनके आस-पास प्रशंसकों की भीड़ थी। पर आज कोई नहीं जानता कि वह कहां हैं! किस हाल में हैं! यही राजनीति है। ऐसे में राजनीति गुरु ने ऐसे गुमनाम सियासी सूरमाओं की वर्तमान स्थिति को खंगालने की कोशिश की है। आप भी ऐसे लोगों के बारे में जानिये...और यह भी जानिये कि ऐसा क्यों हुआ!

आजसू के संस्थापक व पूर्व विधायक सूर्य सिंह बेसरा का नाम कभी झारखंड की सियासत में एक तेजतरार नेता रूप में था। झारखंड अलग राज्य की लड़ाई के दौरान उन्होंने रांची से दिल्ली तक सरकारों की नींदें उड़ा दी थी। श्री बेसरा 1985 में घाटशिला विधानसभा क्षेत्र से जेएमएम की टिकट पर चुनाव लड़े। 22 जून 1986 को आजसू की स्थापना की फिर 1990 में दूसरी बार आजसू समर्थित उम्मीदवार के रूप में उसी विधानसभा से चुनाव लड़े तो रिकार्ड वोटों से जीतकर विधायक बने। झारखंड अलग राज्य के लिए उन्होंने छात्रों के साथ मिलकर हड़ताल किया उन्हें जेल भी जाना पड़ा।

सूर्य सिंह बेसरा का राजनीतिक कद और उनके जुझारूपन का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि जब अलग झारखंड राज्य के लिए आंदोलन चल रहा था तब आजसू के महासचिव सूर्य सिंह बेसरा ने एक अप्रत्याशित और ऐतिहासिक कदम उठाया था। वे घाटशिला से विधायक चुने गए थे। विधानसभा में उन्होंने कहा था कि झारखंड अलग राज्य के लिए विधायक अपने पद से इस्तीफा दे दें। अपनी बात को सच साबित करने के लिए बेसरा खरसावां शहीद स्थल गए, शहीदों को नमन करते हुए, उन्हें साक्षी मानते हुए विधायक के पद से इस्तीफा दे दिया। और अपने सारे प्रमाण पत्र को जला दिया। झारखंड राज्य के लिए बेसरा की यह एक बड़ी कुर्बानी रही।

हालांकि इसके बाद सूर्य सिंह बेसरा धीरे-धीरे झारखंड की राजनीति में हाशिए पर चले गए। इसके बाद भी उन्होंने राजनीतिक रूप से अपनी सक्रियता बनाए रखने की भरसक कोशिश की है और झारखंड पीपुल्स पार्टी के बैनर तले चुनाव में कई बार अपना किस्मत भी आजमा चुके हैं। पर वे सफल नहीं हो सके।

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