विपक्ष एकजुट, एनडीए में फूट

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झारखंड के दो विधानसभा सीटों सिल्ली और गोमिया में हुए उपचुनाव के नतीजे आ चुके हैं। दोनों सीटों पर झामुमो का कब्जा बरकरार रहा। सिल्ली से झामुमो प्रत्याशी सीमा महतो ने आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो को 13,510 वोटों से हराया जबकि गोमिया से झामुमो प्रत्याशी बबिता देवी ने आजसू उम्मीदवार लंबोदर महतो को 1341 वोटों से पटकनी दी। झामुमो की इस जीत और बीजेपी, आजसू की हार के पीछे की जो कारण हैं वह धीरे-धीरे सतह पर आने लगे हैं।
झामुमो नेता हेमंत के नेतृत्व में एकजुट विपक्ष के हाथों मिली करारी हार से तिलमिलाए एनडीए में पहले दिन ही बयानबाजी शुरू हो गई। बीजेपी और आजसू के नेता सामने आए और एक-दूसरे पर आरोप लगाने लगे कि हार के खलनायक कोई और नहीं उनका सहयोगी दल ही है। ऐसा लगा कि दोनों दलों को पहले से ही पता था कि उनका पार्टनर ही जीत में रोड़ा अटका सकता है। उनका रास्ता रोक सकता है। और हुआ भी ऐसा ही। एनडीए की हार तो हुई ही। उसकी साख भी दांव पर लग गई। इस चुनाव परिणाम ने एक साथ ऐसे कई पुराने मुद्दों अचानक उभार दिए हैं जो आजसू- बीजेपी के बीच पिछले साढ़े तीन सालों से अंदर ही अंदर किसी तरह ढंककर रखे जा रहे थे। एनडीए पार्टनर आजसू सरकार के कई फैसलों का विरोध तो करता था, लेकिन सत्ता के साथ था तो जनता ने उस विरोध को पॉलिटिकल स्टंट से अधिक और कुछ भी नहीं समझा। विपक्ष तो यहां तक कहता रहा कि सत्ता में रहकर सुदेश महतो का यह विरोध सिर्फ दिखावा है और कुछ भी नहीं। कुछ हद तक आम आवाम में भी ये धारणा उस समय बनती दिखी जब मुख्यमंत्री रघुवर दास ने सीएनटी- एसपीटी संशोधन विधेयक, स्थानीय नीति में संशोधन को मंजूरी दी। पूरा विपक्ष इस संशोधन के खिलाफ था, सड़क पर था, सदन में भी इस विधेयक का जोरदार विरोध होता रहा था। विपक्ष के विरोध के कारण पूरा बजट सत्र बाधित रहा। कई विधायकों को उनके विरोध करने के कारण सदन के सत्र से निलंबित तक कर दिया गया। पर आजसू सरकार के साथ रही उसने इसका सदन में विरोध नहीं किया, केवल सड़क पर आजसू के विरोध के स्वर सुनायी पड़े।
इस मुद्दे को लेकर सुदेश महतो और उनकी पार्टी ने सदन के बाहर खूब आवाज उठायी लेकिन उनके इस विरोध को सियासी पैंतरा समझा गया। अपने इस विरोध से न तो आजसू सरकार पर दबाव बना पाया और नहीं जनता को यह समझा पाया कि वह उसकी हितैषी पार्टी है। हालांकि, इस मुद्दे पर बाद में विपक्षी दलों के घेरने के बाद जब भाजपा के ही कई विधायकों ने विरोध के सुर तेज कर दिए तो आखिरकार सरकार बैकफुट पर आयी और संशोधन को वापस लेना पड़ा। कुल मिलाकर यह हुआ कि विपक्ष ने तो इसे अपनी जीत बताया लेकिन आजसू ऐसा नहीं कर सकी और वह सरकार के साथ ही खड़ी दिखी। उपचुनाव में हार के बाद सुदेश महतो के बयान पर गौर करें तो इस बात की तस्दीक होती है कि वे नहीं चाहते थे कि सरकार कोई भी ऐसा फैसला लेकर आए जिससे सहयोगी दल होने के नाते उनकी सियासी जमीन पर खतरा पैदा हो।

विपक्ष इसी फॉर्मूले पर आगे बढ़ रहा है हालांकि बीच में निकाय चुनाव के दौरान सभी दल अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरे थे, लेकिन इस पर उन्होंने पहले ही साफ कर दिया था कि निकाय चुनाव में महागठबंधन के तहत चुनाव नहीं लड़ा जाएगा, इसीलिए कांग्रेस, झामुमो, राजद, झाविमो, लेफ्ट सारे दल अलग-अलग चुनाव में उतरे। निकाय चुनाव में भी कांग्रेस, झामुमो ने ग्रामीण इलाकों में ठीक-ठाक प्रदर्शन किया और अपनी जोरदार मौजूदगी नेे भाजपा को यह एहसास करा दिया कि आने वाले समय में उसकी चुनौतियां बढ़ने वाली हैं। बहरहाल, भाजपा को जिस प्रकार की जीत निकाय चुनाव में मिली, उससे पार्टी के नेताओं को यह जरूर लगने लगा कि भाजपा के सामने विपक्ष टिक नहीं पाएगा। पार्टी के कई नेताओं ने तो सरेआम यह कह भी दिया कि राज्य सरकार के विकास कार्यों से आम आवाम खुश है, भाजपा की लहर अभी भी कायम है। लोगों से सीधा संपर्क कर रहे थे। भाजपा के सभी बड़े नेताओं को उम्मीद थी कि गोमिया पर जीत उनकी पार्टी के उम्मीदवार की ही होगी। उधर, 25 मई को सिंदरी में हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र के दौरे से भी यह कहा जा रहा था कि वोटरों पर इसका कुछ न कुछ तो प्रभाव जरूर पड़ेगा। लेकिन तमाम दांव-पेंच को जनता ने खारिज कर दिया और झामुमो प्रत्याशी के सिर पर जीत का ताज पहना दिया।
ऐसे समय में जब सरकार का पूरा अमला गोमिया में दिन-रात कैंप कर रहा हो, विपक्ष के लिए जीत की राह उतनी आसान नहीं थी। इसके लिए उन्हें भी खूब पसीना बहाना पड़ा। इन दोनों सीटों पर पूरा विपक्ष गांव-गांव जाकर लोगों से जनसंपर्क कर रहा था। कांग्रेस, राजद, झाविमो और लेफ्ट के नेता भी लगातार मतदाताओं से मिल रहे थे उन्हें अपने उम्मीदवार के पक्ष में वोट देने के लिए तैयार कर रहे थे।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ऐसा वर्तमान दौर में झारखंड में पहली बार हुआ है कि विपक्षी दलों के सभी प्रमुख एक साथ मंच शेयर कर रहे हों और गांव-गांव जाकर मतदाताओं से वोट मांग रहे हों। इसका मतलब साफ है कि विपक्ष अब इस बात को भलीभांति समझ चुका है कि भाजपा या एनडीए को हराने के लिए आपसी मतभेद को भूलाना होगा। एक-दूसरे पर छींटाकशी और आरोप-प्रत्यारोप लगाने के बजाय भाजपा के खिलाफ संगठित होना होगा।
विपक्षी एकजुटता से भाजपा का कुछ भी बिगड़ने वाला नहीं है, यह भ्रम एक महीने में ही टूट गया। उपचुनाव में जिस प्रकार विपक्षी दलों ने एक मंच पर खड़ा होकर अपनी ताकत दिखायी उसने भाजपा के विकास के दंभ की सारी हवा निकाल दी। गोमिया में पार्टी प्रत्याशी माधवलाल सिंह तीसरे स्थान पर रहे। जबकि अपने उम्मीदवार को जीताने के लिए प्रदेश भाजपा की पूरी टीम क्षेत्र में कैंप कर रही थी। खुद मुख्यमंत्री रघुवर दास इस गोमिया का लगातार दौरा कर रहे थे। राजनीति में दल या नेता तकनीकी तौर पर हारते जरुर हैं, लेकिन असल में हारते हैं समीकरण।
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