नीतीश ने क्यों बढ़ाया मांझी की तरफ दोस्ती का हाथ !

कल तक एक दूसरे को पानी पी-पीकर कोसनेवाले पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी और वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बीच कुछ सियासत पक रही है | जिस मांझी ने नीतीश की पार्टी तोड़ दे दी | जिसने नीतीश का पूरा सत्ता गणित उलझा दिया | चुनावों में नीतीश पर इतने तरह के आरोप लगाये, कई व्यक्तिगत भी | वही नीतीश मांझी पर इतना सियासी प्यार क्यों बरसाने लगे ! जो नीतीश मांझी को सियासी तौर पर ख़त्म करना चाहते थे, उसी नीतीश ने ना केवल मांझी के गांव को ना केवल प्रखंड बनाने की घोषणा की बल्कि करोड़ों रूपये के विकास योजनाओं की घोषणा भी मांझी के कहने पर की | इस नए सियासी प्रेम की राजनीतिक हलकों में तरह- तरह की व्याख्या हो रही है |

वरिष्ठ भाजपा नेता उपेन्द्र चौहान कहते हैं कि एनडीए अपने सभी घटक दलों को साथ लेकर चलना चाहती है | जीतनराम मांझी ने अपने गांव को प्रखंड बनाने तथा कई विकास योजनाओं की बात की थी, इसके अलावा वो अपने बेटे को किसी निगम का चेयरमैन बनाकर उसे राज्यमंत्री का दर्जा दिलाना चाहते हैं | उनकी पहली बात तो पूरी कर दी गयी दूसरे पर सरकार विचार कर रही है |

पर क्या इतनी ही बात है ! वरिष्ठ पत्रकार नीलांशु रंजन कहते हैं कि बिहार में सरकार बनने के इतने दिनों बाद तक जीतनराम मांझी का ख्याल नीतीश कुमार को क्यों नहीं आया था ! जब से मांझी और कुशवाहा के लालू के साथ जाने की बात सामने आई तो पोलिटिकल इंजीनियरिंग तेज़ हो गयी | नीलांशु कहते हैं कि नीतीश कुमार को अगले चुनाव की फ़िक्र है |
ये नयी दोस्ती प्लान उसी तथ्य को ध्यान में रखकर बनाई जा रही है | नीतीश कुमार को पता है कि अगर मांझी और कुशवाहा लालू के साथ चले गए तो लालू का किला अभेद्य हो जायेगा | बस इसी बात के लिए ये सारी सियासी कवायद है | लालू के छठ प्लान को पंक्चर करना चाहते हैं नीतीश |

पर क्या मांझी इतने बड़े फैक्टर हैं ! क्या महादलित वोट बैंक पर प्रभाव है मांझी का, अगर हां तो मांझी चुनाव में अपने को छोड़कर हर जगह क्यों हारे ! तो क्या एनडीए की ओर से जेडीयू पर दवाब है कि वो किसी भी सहयोगी को छतरी से किसी भी’ कीमत पर बाहर नहीं जाने दे | कुछ तो है जो लालू और नीतीश दोनों ही अपने सियासी चूल्हे पर पका रहे हैं ! अब यह देखना दिलचस्प होगा कि छठ बाद बिहार को कौन सा सियासी प्रसाद मिलता है |

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