नोटबंदी, जीएसटी का राजनीतिक नुकसान उठाने को तैयार: मोदी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि अपने कार्यकाल के दौरान लिए गए बड़े आर्थिक फैसले जैसे नोटबंदी, जीएसटी, बैंकिंग व्यवस्था में सुधार और आधार को प्रभावी करने का राजनीतिक नुकसान उठाने के लिए वह तैयार हैं. खासबात है कि गुजरात चुनावों में जब प्रचार प्रक्रिया जारी है तो प्रधानमंत्री का यह बयान मायने रखता है कि उनकी सरकार को इन बड़े आर्थिक फैसलों से चुनाव में राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है.

हालांकि पीएम मोदी ने अपने फैसलों को सही ठहराते हुए कहा कि '2014 में जब हम आए तो हमें विरासत में क्या मिला था? अर्थव्यवस्था की हालत, गवर्नेंस की हालत, फिसकल ऑर्डर और बैंकिंग सिस्टम की हालत, सब बिगड़ी हुई थी. हमारा देश फ्रेजाइल फाइव में गिना जाता था.' बड़े और स्थायी परिवर्तन ऐसे ही नहीं आते उसके लिए पूरे सिस्टम में बदलाव करने पड़ते हैं. जब ये बदलाव होते हैं तभी देश सिर्फ तीन साल में Ease Of Doing Business की रैकिंग में 142 से 100 पर पहुंच जाता है.

जब योजनाओं में गति होती है, तभी देश में प्रगति आती है. कुछ तो परिवर्तन आया होगा जिसकी वजह से सरकार की तमाम योजनाओं की स्पीड बढ़ गई है. साधन वही हैं, संसाधन वहीं हैं, लेकिन सिस्टम में रफ्तार आ गई है. ऐसा हुआ है क्योंकि सरकार ब्यूरोक्रेसी में एक नई कार्यसंस्कृति पैदा कर रही है.

जिस दिन देश में ज्यादातर खरीद-फरोख्त, पैसे के लेन-देन का एक टेक्निकल और डिजिटल होने लग गया, उस दिन से संगठित भ्रष्टाचार काफी हद तक थम जाएगा. मुझे पता है, इसकी मुझे राजनीतिक तौर पर कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी, लेकिन उसके लिए भी मैं तैयार हूं.

आधार के साथ मोबाइल और जनधन की ताकत जुड़ जाने से एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण हुआ है, जिसके बारे में कुछ साल पहले तक सोचा भी नहीं जा सकता था. पिछले 3 वर्षों में आधार की मदद से करोड़ों फर्जी नाम सिस्टम से हटाए गए हैं. अब बेनामी संपत्ति के खिलाफ भी ये एक बड़ा हथियार बनने जा रहा है.

ऐसे ही एक बदलाव को को आधार नंबर से मदद मिल रही है. आधार एक ऐसी शक्ति है जिससे ये सरकार गरीबों के अधिकार को सुनिश्चित कराना चाहती है. सस्ता राशन, स्कॉलरशिप, दवाई का खर्च, पेंशन, सरकार की तरफ से मिलने वाली सब्सिडी, गरीबों तक पहुंचाने में आधार की बड़ी भूमिका है.

वहीं पीएम मोदी ने कहा कि नोटबंदी के बाद देश में बड़ा बदलाव देखने को मिला है. स्वतंत्रता के बाद पहली बार ऐसा हुआ है, जब भ्रष्टाचारियों को कालेधन के लेन-देन से पहले डर लग रहा है. उनमें पकड़े जाने का भय आया है. जो कालाधन पहले पैरेलल इकॉनॉमी का आधार था, वो फॉर्मल इकोनॉमी में आ गया है.

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