सबसे खौफनाक क्रिया को अंजाम दे ही दिया आपने

-कुमार कौशलेन्द्र


हिंदी के अप्रतिम कवि केदारनाथ सिंह जी नहीं रहे, अनंत की यात्रा पर चले गये किन्तु उनकी सहजता और उनका कृतित्व सदैव साहित्य जगत को आम जन से सेतु की भांति जोड़ता रहेगा...

10 अगस्त 1996 की दोपहर रांची हवाई अड्डे पर प्रतीक्षारत था मैं...विमान आगमन के कुछ देर बाद आप बाहर आये कुर्ता-पायजामा और कांधे पर साल...मैं कहां पहचानता था आपको...मेरे मित्र और सहकर्मी स्वर्गीय गोपी कृष्ण उपाध्याय जी ने कहा- वही हैं केदार बाबू...हम आपकी ओर लपके...आपने तो प्रणाम करने से पहले मेरे कांधे पर हाथ रखते हुए, कहा- कहां चलना है?

...मैं भौंचक्क...अनेक शब्द पीरो रखे थे मन ही मन...आप जैसे ख्याति वाले कवि और विद्वान को यूं अपना परिचय दूंगा...आदि...आदि...|लेकिन आपने तो पहली नजर में ही मुझे आत्मीयता के उस पाश में जकड़ लिया जिसके वशीभूत होकर मुझे ऐसा लगने लगा, मानो मैं बरसों से आपको और आप मुझे जानते हों...एमबेसडर में आपको लेकर कब मेन रोड स्थित अपने आफिस पहुंच गया पता ही नहीं चला... हमारे सहकर्मियों से मिलने के बाद आपने पूछा- शाम कितने बजे का कार्यक्रम है...अच्छा 7 बजे...आप लोग तैयारी करें...मैं तब तक आराम कर लेता हूं...आपकी सहजता से हम सब मुग्ध ही तो थे...|

बारिश की खलल के बाद शाम को जब मैं आपको कार्यक्रम के लिये आमंत्रित करने पहुंचा तो आपका दूसरा रूप देखने को मिला- 'हो गयी तैयारी ...मैंने कहा जी...लोकार्पण हेतु मुख्य अख़बार तो आ गया है किन्तु परिशिष्ट नहीं छप पाया है...थोडा वक़्त लगेगा...आप बोले- कोई बात नहीं कार्यक्रम चलते-चलते आ जायेगा| आपकी सहजता से मैं आपको समझ ही नहीं पा रहा था|

.....खैर, साप्ताहिक अख़बार "वनांचल प्रहरी" का लोकार्पण समारोह शुरू हुआ| मंचासीन होने के पश्चात् आपने मुझे अपने पास बुलाया और बोले- मंच संचालन कौन कर रहे हैं? मैंने संकोच के साथ कहा- जी...मुझे ही यह जिम्मेवारी मिली है| आपके आँखों की वो चमक अब तक याद है- वैरी गुड...मुझे बोलने के लिए आमंत्रित करने से पहले मंचासीन गणमान्यों का ब्यौरा दे-देना ठीक...मैं बोला जी...कार्यक्रम शुरू हुआ...|

स्कूल और कॉलेज के बाद पहला मौका था मेरे लिये...सैकड़ों की भीड़ और एक अख़बार का लोकार्पण...लेकिन आपकी आँखें तो मानो मुझ पर ही टिकी थी...मुस्काती सी आँखें...मानों एक अभिवावक अपने बच्चे को कह रहा हो- कम ऑन बेटा...यू कैन डू इट...| किताबों में पढ़ा था कि सिद्ध लोग आँखों से ही उर्जा का संचार कर देते हैं लेकिन पहली बार प्रत्यक्ष अनुभव हुआ था मुझे|...लोकार्पण कार्यक्रम के दौरान कुछ अव्यवस्था हुई ...मैंने कहा- सुर का संबंध शोर से नहीं होता कृपया शान्ति बनाये रखें...आपने गहरी मुस्कान बिखेरी...में समझ नहीं पाया...| खैर आयोजन भव्यता से संपन्न हो गया...| अख़बार के प्रधान संपादक सुनील शर्मा जी भी गदगद हुए...आकाशवाणी के सुनील सिंह बादल जी ने एक रेडियो रिपोतार्ज भी रिकॉर्ड किया जिसका रांची केन्द्र से प्रसारण भी हुआ|

मंच से उतरते वक़्त आपने मेरे सिर पर अपना हाथ यूँ फेरा मानों अपना समस्त आशीष मुझे दे देना चाहते हों...| भोजन के बाद जब आपको विदा कर निकल रहा था तो आप बोले...क्योँ कौशलेन्द्र...अख़बार के लोकार्पण को सुर संध्या में तब्दील करने की तैयारी थी क्या?...सुर का संबंध शोर से नहीं होता कृपया शान्ति बनाये रखें...अविरल मुस्कान खुली हंसी में तब्दील हो गयी थी? मुझे सांप सूंघ गया...कुछ बोल पाता इससे पहले आपके वो वाक्यांश मेरी कानों से टकराये- "बहुत अच्छा संचालन किया...शब्दों के चयन व उनके प्रकटीकरण में हमेशा सतर्क रहना...जहां भी शब्द प्रवाह में चूक समझ आये...तत्काल अगले शब्द से उसे संभाल लेना ही कला है...वाह ये कला भी आती है तुम्हे...| सच कहूं तो उस वक़्त मुझे आपकी बातों का गूढार्थ समझ में नहीं आया था लेकिन बाद के वर्षों में पल-पल आपका यह ज्ञान मेरे काम आया|

अगले दिन भी आप रांची में रुके...जाने के वक़्त कहा- दिल्ली आना तो मिलना| दिल्ली में तो नहीं लेकिन 2005 में आप से हैदराबाद में मुलाकात हो गयी...केन्द्रीय विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में बतौर मुख्य वक्ता पधारे थे आप...अखबारनवीस की भांति मैं भी पत्रकार दीर्घा मैं बैठा था| मुझे देखते ही आप की आँखें चमक उठीं...याद है मुझे आपने बिना एक पल गंवाये मुझे अपने पास बुलाया..."अरे वाह...यहां हैदराबाद में...मैं कुछ कहता इससे पूर्व प्रख्यात विद्वान वेणुगोपाल जी ने कहा- हां...अब हैदराबाद में हीं तो हैं कौशलेन्द्र...दैनिक "स्वतंत्र वार्ता" को अपनी सेवाएं दे रहे हैं...|

पुनः आपका वो आत्मीय अंदाज जिसमें अतीत के पन्ने चाव से खंगाले जाते हैं...वो अख़बार निकल रहा है न...|...यहां कब से? मैंने कहा जी ...2000 में ही विशाखापत्तनम आ गया था स्वतंत्र वार्ता का स्थानीय संपादक बन कर...कुछ माह पूर्व ही हैदराबाद मुख्यालय में तैनात किया गया हूँ ...आपका वो उलाहना- इतने साल में कभी दिल्ली जाना नहीं हुआ क्या?...आज तो संयोग से मिल गये...मिलते रहा करो...| मैं बोला जी ...आप अगले माह दिल्ली में रहेंगे...? आप के वो शब्द ---आओ तो सही... जाऊंगा कहां?

लेकिन नियति की रेखाओं ने शायद मुझे आपके उलहाने की जद में रखने का तय कर रखा था...आप तो अनंत की यात्रा पर निकल गये|...रांची से विदा होते वक्त जब मैं सुनील जी, संजय जी और स्वर्गीय गोपी जी के साथ आपको हवाई अड्डे पहुँचाने जा रहा था तो गलती से कार का एक चक्का तत्कालिन छोटे डिवाइडर पर चढ़ गया था...आप अनायास बोल पड़े थे...दिल्ली भेजोगे या कहीं और...फिर उन्मुक्त मुस्कान...|

पता नहीं क्यों आज मुझे श्री ओम थान्वी जी द्वारा पोस्ट की गयी काव्य 96 के उस घटना क्रम से जोड़ रही हैं.....

जाऊंगा कहाँ
रहूँगा यहीं

किसी किवाड़ पर
हाथ के निशान की तरह
पड़ा रहूँगा

किसी पुराने ताखे
या सन्दूक की गंध में
छिपा रहूँगा मैं

दबा रहूँगा किसी रजिस्टर में
अपने स्थायी पते के
अक्षरों के नीचे

या बन सका
तो ऊंची ढलानों पर
नमक ढोते खच्चरों की
घंटी बन जाऊंगा
या फिर माँझी के पुल की
कोई कील

जाऊंगा कहाँ

देखना
रहेगा सब जस का तस
सिर्फ मेरी दिनचर्या बदल जाएगी
साँझ को जब लौटेंगे पक्षी
लौट आऊँगा मैं भी
सुबह जब उड़ेंगे
उड़ जाऊंगा उनके संग...|

आपने तो ये भी लिख ही डाला था---
"मैं जा रही हूं- उसने कहा, जाओ- मैंने उत्तर दिया,
यह जानते हुए कि जाना हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है"|
...आपको शत-शत नमन...

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