मैंने हमेशा सही किया, कुछ लोगों को पचा नहीं: रेणु गोपीनाथ

झारक्राफ्ट को आज कुछ लोग विवादों में डाल रहे हैं, लेकिन थोड़ा पीछे चलिए, करीब डेढ़ साल पहले झारक्राफ्ट की पहचान बेहद सीमित थी, सूबे के कई संस्थाओं की तरह ये भी जैसे –तैसे काम कर रही थी। पर इस संस्था में पहली बार व्यापक बदलाव की रणनीति बनाई गई। यह काम इतना आसान नहीं था। इसके सेहत को सुधारने की चुनौती बड़ी थी। और इस काम को जब सीईओ रेणु गोपीनाथ पणिक्कर ने अपने हाथों में लिया तो धीरे-धीरे इसकी तस्वीर बदल गई। घाटे में चल रहे झारक्राफ्ट ने कई कीर्तिमान बनाए, नई ऊंचाइयां हासिल की।

रेणु गोपीनाथ पणिक्कर ने फैसला किया कि झारक्राफ्ट को मल्टीनेशनल कंपनी की तरह चलाया जाएगा। इसके लिए प्रोफेशनलिज्म की जरुरत थी, इसको ध्यान में रखते हुए नई सॉफ्टवेयर से लेकर स्टॉक ऑडिटिंग तक की जरूरी तकनीक अपनाई गई। देखते ही देखते इसका स्वरूप ग्लोबल हो गया। अमेजन जैसी कंपनियां इसके ब्रांड से जुड़ी. पर जिस शख्सियत ने इस मुकाम को पाने के लिए कड़ी मेहनत की, अपने कर्मचारियों में अथक प्रयास करने के लिए ऊर्जा का संचार किया, वह आज दरकिनार कर दी गई है।

झारक्रॉफ्ट की सीईओ रेणु गोपीनाथ कहती हैं कि पिछले डेढ़ साल में उन्होंने जो इस संस्था के लिए किया, उससे वो तो संतुष्ट हैं, इसके लिए वो मुख्यमंत्री और उनके प्रधान सचिव की बेहद तारीफ़ भी करती हैं , लेकिन सरकार में बैठे कुछ लोग उनके काम से खुश नहीं हैं। रेणु कहती हैं कि वे अपने फैसलों को लेकर आज भी अडिग हैं, लेकिन सरकारी संस्था में काम करने के बाद उन्हें ऐसा लगता है कि शायद उनका झारक्रॉफ्ट ज्वाइन करने का फैसला गलत था।

रेणु कहती हैं कि सरकारी संस्था में काम करने का उनका ये पहला अनुभव था, वे स्वीकार भी करती हैं कि झारखंड के दूर-दराज के इलाकों में बुनकरों और खासकर महिला उद्यमियों के साथ काम करना, एक तरह से उनकी जिंदगी का अनोखा अनुभव था। वे बताती हैं कि ईश्वर ने झारखंड को अकूत प्राकृतिक संसाधन दिए हैं, झारखंड के लोग भी मेहनती हैं, काम करने में विश्वास करते हैं। उनमें सम्मान के साथ जीने की गजब की ललक है। इसके कारण ही वे झारक्राफ्ट को इतनी उंचाई तक लाने में सफल हुई हैं।

रेणु ने बताया कि पिछले डेढ़ साल में उन्होंने दिन-रात 24 जिलों में दौरा किया। लोगों से मिल कर उनकी जरुरतों को जानने की कोशिश की। हर जिले में नए सिरे से स्वयं सहायता समूहों का गठन कर उन्हें रोजगार से जोड़ने का काम किया। पलामू से लेकर पाकुड़ तक इन समूहों को सरकार के स्तर से जो भी सुविधाएं मुहैया करायी जा सकती थी, उसे पूरा करने का भरपूर प्रयास किया।

रेणु दावा करती हैं वो झारखंड के 40-50% गांव घूम चुकी हैं, कहती हैं, गांवों की स्थिति बहुत खराब है, खासतौर पर वे परिवार जो कुटीर उद्योग से जुड़े हैं। सरकार की ओर से अगर उन्हें मदद मिले तो राज्य का कायाकल्प हो सकता है। बुनकरों की स्थिति तो सबसे ज्यादा खराब है। वो कहती हैं “मैंने ऐसे सभी उद्यमियों की लिस्ट बनाई और उन्हें जरुरी सामग्री उपलब्ध करवाकर उनके द्वारा तैयार उत्पाद को झारक्राफ्ट के जरिए सही बाजार तक पहुंचाने में मदद की, इससे उत्पादन तो बढ़ा ही, उच्च क्वालिटी के उत्पाद भी बनकर बाजार में आने लगे, जिससे झारक्राफ्ट के साथ ही बुनकरों की आर्थिक स्थिति में भी व्यापक बदलाव आया”। रेणु कहती हैं कि सरकार की नीति है कि राज्य में लोगों को हुनरमंद बनाया जाए, पर अगर सरकार सही तरीके से इस पर काम करे तो झारखंड में हुनर की कोई कमी नहीं है। गांवों में महिलाएं हैंडीक्राफ्ट के कई ऐसे सामान तैयार करती हैं जिससे सरकार को फायदा तो होगा ही इसके साथ ही लोगों के जीवन स्तर में भी काफी हद तक सुधार होगा।

रेणु कहती हैं कि वे सरकार के फैसले पर तो सवाल नहीं उठा सकतीं लेकिन उन्होंने जो काम किए हैं वह आनेवाले दिनों में याद किए जाएंगे। कहती हैं कि “ इन डेढ़ सालों में मैंने जो काम किए हैं, उससे मैं पूरी तर संतुष्ट हूं, पर अफसोस सिर्फ इसी बात का है कि कई ऐसे काम थे जिसे पूरा करने का बीड़ा उठाया था, उसे कर नहीं पायी। उन्हें पूरा नहीं कर पाने का मलाल जरूर है”।

इसी सिलसिले में रेणु कहती हैं कि वो लघु एवं कुटीर उद्यम बोर्ड की सीईओ भी रही हैं। बताती हैं कि रांची के सिदरौल में लाह परिष्करण इकाई को फिर से चालू किया गया है। झास्कोलेम्फ़ की यह इकाई 16 वर्षों से बंद पड़ी थी। इसके लिए उन्होंने सरकार के स्तर पर रिकॉर्ड समय में काम करते हुए झासको लैंप और आइआइएनआरजी के बीच एमओयू करवाया , जिसका उद्घाटन 16 फरवरी को मुख्यमंत्री के हाथों हुआ। वो बताती हैं कि किस प्रकार उन्होंने दिन-रात काम करके 100 सखी मंडल ग्रुप बनाया. वो कहती हैं कि इसमें उन्हें आईआईएनआरजी के केके शर्मा का भरपूर सहयोग मिला। इसके साथ ही सरकार के स्तर पर प्रधान सचिव सुनील वर्णवाल ने उनकी खूब मदद की। रेणु गोपीनाथ बताती हैं कि सिर्फ चंद महीनों में ही इसका फायदा सबके सामने है. इस निकाय चुनाव में इस्तेमाल किए गए सीलिंग वैक्स इसी ईकाई से तैयार किए गए हैं।

इन सब के बावजूद लघु एवं कुटीर उद्यम बोर्ड के सीईओ पद से उन्हें क्यों हटाया गया, इस सवाल का जवाब देते हुए वह कहती हैं “बोर्ड में डिस्ट्रिक्ट को-ऑर्डिनेटर और ब्लॉक को-ऑर्डिनेटर के लिए लोगों को रखने की सिफारिश आ रही थी लेकिन मैंने कुछ मानक तय कर रखे थे, इसलिए सेलेक्शन में किसी भी प्रकार का कोई समझौता नहीं किया, इस दौरान कई विधायक, सांसदों की पैरवी आई, यहां तक कि तत्कालीन सीएस ने भी पैरवी की पर मैं नहीं मानी। जो मानक तय थे उसी के आधार पर लोगों का सेलेक्शन हुआ”। वो कहती हैं “उनके इस प्रोफेशनलिज्म से सरकार में उंचे ओहदे पर बैठे कुछ लोगों को काफी तकलीफ भी हुई पर मैंने जो तय किया था, वही किया”।

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