वेंकैया कैसे बने मोदी की पसंद?

बीजेपी चाहती है कि उप राष्ट्रपति पद पर बैठने वाला शख्स ऐसा हो जो राज्यसभा के सियासी समीकरण को संभाल सके, क्योंकि वहां बीजेपी कमजोर है. ऐसे में एम वेंकैया नायडू का अगला उपराष्ट्रपति बनना आंकड़ों के लिहाज से महज औपचारिकता भर है. नायडू के पास प्रशासनिक अनुभव भी है. ऐसे में उनका राजनीतिक कौशल और उनका कद्दावर व्यक्तित्व सदन चलाने में काम आ सकता है. नायडू 4 बार राज्यसभा के सदस्य रहे हैं. उनका 25 साल से लंबा संसदीय कार्य का अनुभव भी है.

68 साल के वेंकैया नायडू नरेंद्र मोदी सरकार में आवास और शहरी विकास मंत्रालय के साथ- साथ सूचना प्रसारण मंत्रालय जैसे अहम पदों पर मौजूद थे. इससे पहले वे इसी सरकार में संसदीय कार्यमंत्री भी रह चुके थे. उन्हें प्रधानमंत्री के बेहद करीबी मंत्रियों में गिना जाता रहा है, ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि वेंकैया के लिए उपराष्ट्रपति का पद प्रमोशन जैसा है या फिर उन्हें सक्रिय राजनीति से दूर रखने की कोशिश है.

कुछ राजनीतिक विश्लेषकों की राय है कि वेंकैया नायडू की इच्छा थी कि उन्हें उपराष्ट्रपति का पद मिले और उनकी वफादारी का इनाम उन्हें मिल गया. हालांकि नायडू की गिनती वैसे नेता की नहीं रही है जिनका कोई अपना व्यापक जनाधार रहा हो, लेकिन "नायडू ऐसे नेता रहे हैं, जिनका आधार बड़े जनाधार वाले नेताओं में हमेशा रहा है." ऐसे में बढ़ती उम्र के हिसाब से वे एक सम्मानित जगह चाहते थे और इसका इनाम उन्हें मिला है."

वैसे ये जानना कम दिलचस्प नहीं है कि 2014 के आम चुनाव से पहले जब भारतीय जनता पार्टी के अंदर नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने का जो तीन बड़े नेता विरोध कर रहे थे, उनमें वेंकैया नायडू भी एक थे. जाहिर है कि ये विरोध एक तरह से लालकृष्ण आडवाणी के समर्थन के लिए ही था, लेकिन इसी दौरान संघ के नेताओं से हुई कुछ मुलाकातों में वेंकैया नायडू ने नरेंद्र मोदी के प्रति बढ़ते समर्थन को भांप लिया और उनकी वफादारी देखते ही देखते नरेंद्र मोदी के साथ हो गई.

वैसे एक बड़ा सवाल ये भी उठता है कि उपराष्ट्रपति के तौर पर वेंकैया को उम्मीदवार बनाना केवल उनकी वफादारी का इनाम भर है?
दरअसल बीजेपी की रणनीति साफ है कि उत्तर भारत से राष्ट्रपति के बाद उपराष्ट्रपति दक्षिण भारत का हो, जिससे वहां भी कमल खिलाने का रास्ता आसान हो सके और इसके लिए वेंकैया नायडू से बेहतर और कोई नहीं हो सकता था. इस निर्णय के जरिए भी बीजेपी अपने लिए दक्षिण में संभावना तलाशने की कोशिश करेगी.

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