क्या आदिवासी मुद्दे पर भटक गई BJP !

मनोज कुमार सिंह

राज्य सरकार के लगभग 4 वर्ष पूरे होने वाले हैं, लेकिन वर्तमान समय में आदिवासियों के मुद्दे पर कई ऐसे मामले दिख रहे हैं, जिससे लगता है कि भाजपा आदिवासी के मुद्दे पर पूरी तरह से भटक गई है. पिछले दिनों नेतरहाट के कैबिनेट की बैठक में ही राज्य के लगभग सभी आदिवासी विधायकों का कार्यक्रम में भाग नहीं लेना एक बड़ा मुद्दा हो सकता है. राज्य के आदिवासी विधायक एवं सांसदों को लगातार ऐसा लग रहा है कि उनको सरकार नजरअंदाज कर रही है. सीएनटी-एसपीटी के मामले में पार्टी विधायकों की स्थिति और बढ़ते दबाव के चलते बैकफुट पर जाना पार्टी के लिए महंगा साबित हो सकता है. आदिवासी राजनीति की गहरी समझ रखने वाले विश्लेषक इस प्रकार के हालात के लिए सरकार को ही दोषी मानते हैं, यह सही है कि सरकार ने राज्य के आदिवासियों के विकास के लिए अनेक कदम उठाए हैं, लेकिन ऐसी कौन सी स्थिति है जो लगातार राज्य के आदिवासियों का भरोसा सरकार से उठने लगा है.

उनका कहना है कि सरकार और आदिवासी समाज के बीच संवादहीनता की स्थिति गहरी होती जा रही है, जो सरकार के लिए खतरे की घंटी भी हो सकती है. विगत कुछ दिनों से पत्थर गढ़ी की घटना पर लगातार हो रहे विवाद में पार्टी की किरकिरी साफ दिख रही है. भाजपा नेतृत्व के समक्ष अर्जुन मुंडा ने राज्य के हालात को बता तो दिया है, लेकिन ऐसा लगता है कि पार्टी नेतृत्व ने उनकी बातों को दरकिनार कर दिया है. विगत विधानसभा और लोकसभा चुनाव में आदिवासियों के एक बहुत बड़े तबके ने भाजपा का समर्थन किया था और इसी कारण से राज्य में पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में आई थी. भाजपा नेतृत्व ने पहली बार राज्य में गैर आदिवासी मुख्यमंत्री बना कर बड़ा दांव खेला था लेकिन पार्टी के लिए वह निर्णय उल्टा पड़ता दिख रहा है. वर्तमान समय में राजनीतिक गणित को परखा जाए तो पार्टी इसे कैसे हैंडल करती है, यह सोचनीय विषय है, क्योंकि राज्य की 55% आबादी वाले ओबीसी वर्ग की नाराजगी भी पार्टी के लिए महंगी साबित हो सकती है. 17 साल बाद ही सही ओबीसी समाज के नौजवान अंदर से काफी आंदोलित हैं और उन्हें ऐसा लगता है कि सरकार उन्हें संवैधानिक अधिकारों से वंचित करके बहुत खिलवाड़ कर रही है. देखना यह होगा कि भाजपा के रणनीतिकार भंवर में फंसी पार्टी के जहाज को कैसे पार लगाते हैं.

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