गठबंधन से ही होगी कांग्रेस की राह आसान

झारखंड सरकार की नीतियों के खिलाफ पूरा विपक्ष धीरे-धीरे एक मंच पर आ रहा है। 31 अक्टूबर को भाजपा भगाओ-झारखंड बचाओ महारैली में पूरा विपक्षी कुनबा एकजुट दिखा। इसे मजबूरी कहिए या रणनीति की देश की सबसे बड़ी पार्टी होने का दंभ भरनेवाली कांग्रेस भी क्षेत्रीय दलों के साथ मंच साझा कर रही है। देर से ही सही पर कांग्रेसी नेताओं को अगर यह बात समझ आ गई है तो यह पार्टी के लिए शुभ संकेत है। बहरहाल, यह स्पष्ट है कि आने वाले दिनों में झाविमो, झामुमो ,कांग्रेस, वाम दल चुनाव मैदान में एक साथ महागठबंधन के तहत उतरेंगे।

विपक्षी पार्टियों के नेता भी अब समझने लगे हैं कि भाजपा के मजबूत होते आधार को हिलाने के लिए एक होना जरूरी है। याद रहे कि भाजपा नेता अटल बिहारी बाजपेयी की अगुवाई में डेढ़ दर्जन दलों को मिलाकर सरकार चलायी गई थी। कई अहम मुद्दों पर वैचारिक मतभेद के बावजूद सारे दलों ने कांग्रेस के खिलाफ एकजुटता दिखायी, जिसकी वजह से अंत तक कांग्रेस का जमीनी पकड़ धीरे-धीरे कमजोर होता गया।

इस मामले में क्षेत्रीय दलों ने अलग-अलग राज्यों में अपनी मजबूत पकड़ और जातीय समीकरण की बदौलत जीत हासिल की और कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक पर सेंध भी लगाए। कभी देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस आज 50 सीटों पर सिमट गई है। देखा जाए तो कांग्रेस की ऐसी दुर्गति में क्षेत्रीय छत्रपों का योगदान ज्यादा है। इसलिए पूरे छह दशक से ज्यादा देश पर राज करने वाली पार्टी आज यदि संघर्ष कर रही है तो उसके नेताओं को भाजपा से सीख लेनी होगी। गठबंधन की राजनीति को खुले मन से स्वीकार करना होगा।

कम से कम झारखंड में बन रही राजनीतिक परिस्थितियों में तो समान विचारधारा वाली पार्टियों के नेताओं को गले लगाने से गुरेज नहीं होनी चाहिए।

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