राहुल की एक और हार तय!

नरेंद्र मोदी को लेकर राजनीतिक पर्यवेक्षकों के बीच सबसे ज्यादा उलझन इस बात पर है कि तीन साल पूरे होने के बाद भी प्रधानमंत्री और उनकी सरकार की साख पर जरा भी विपरीत असर नहीं पड़ा है। माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री 2014 से भी ज्यादा लोकप्रिय हो गए हैं। इसका एक बड़ा कारण यह बताया जा रहा है कि विपक्ष के पास मोदी के मुकाबले खड़ा होने वाला कोई नेता नहीं है, इसलिए राष्ट्रीय फलक पर मोदी को कोई चुनौती ही नहीं है। पर वहीं दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी का सुपड़ा हर जगह से साफ होता जा रहा है।

देश की जनता से अच्छे दिनों का वादा करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वक्त में कांग्रेस के बुरे दिन आ गए हैं। राहुल की एक और हार तय हो गई है। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी ने अच्छे दिनों का नारा दिया था। इसके साथ ही कांग्रेस मुक्त भारत का भी नारा दिया गया था। दोनों ही नारों पर भारतीय जनता पार्टी खरी उतरती साबित हो रही है। जहां एक ओर देश नई बुलंदियों को छू रहा है। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी का हर जगह से सफाया होता जा रहा है। एक राज्यर में विधानसभा चुनाव से पहले ही बीजेपी ने अपनी जीत पर मुहर लगवा ली है। वहीं यहां कांग्रेस की हार तय है। जी हां हम बात कर रहे हैं गुजरात विधानसभा चुनाव की। इसी साल के अंत में होने वाला गुजरात विधानसभा चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर बीजेपी तक के लिए बहुत महत्वूवपर्ण है।

दरअसल, लंबे समय बाद गुजरात में ऐसा मौका आया है जब यहां का विधानसभा चुनाव मोदी के नेतृत्व के बिना लड़ा जाएगा। लेकिन, यहां के बनते समीकरणों से साफ है कि कांग्रेस किसी भी कीमत पर ये चुनाव नहीं जीत पाएगी। दरसअल, कांग्रेस पार्टी से नाराज वरिष्ठ नेता शंकर सिंह वाघेला का पार्टी से तलाक हो चुका है। शंकर सिंह वाघेला गुजरात के कद्दावर नेता हैं। उन्होंने पार्टी के लिए यहां बहुत काम किया। लेकिन, वाघेला को इस बात का हमेशा से दर्द रहा कि उन्हों ने पार्टी के लिए सबकुछ किया पर पार्टी ने उन्हें कांग्रेसी तक नहीं माना। वाघेला पहले जनसंघ से जुड़े थे। ये तकलीफ उन्हें आज भी कचोटती है।

16 साल की उम्र में ही वाघेला संघ से जुड़ गए थे। माना जाता है कि गुजरात में बीजेपी की नींव वाघेला ने ही रखी थी। 1997 में वो कांग्रेस से जुड़ गए थे। लेकिन, तब से लेकर अब तक कांग्रेस गुजरात की सत्ता में अपनी जगह नहीं बना पाई। इस बार कांग्रेस को ये उम्मीद थी कि गुजरात विधानसभा के चुनाव में उसका बेहतर प्रदर्शन होगा। लेकिन, अब वाघेला ने भी साथ छोड़ दिया है। जिससे कांग्रेस की उम्मीदों पर भी पानी फिर गया। वाघेला का जाना कांग्रेस पार्टी के लिए बहुत बड़ा झटका है। जबकि इसका सीधा फायदा मोदी और भारतीय जनता पार्टी को मिलेगा। वाघेला मोदी और अमित शाह की गैरमौजूदगी में विजय रुपानी को टक्कार दे सकते थे।

लेकिन, अब कांग्रेस पार्टी के सारे समीकरण बिगड़ गए हैं। हालांकि ऐसा नहीं है कि शंकर सिंह वाघेला अचानक नाराज हुए और पार्टी से तलाक ले लिया। उन्होंने पहले भी कई बार पार्टी से अपनी नाराजगी जाहिर की। लेकिन, कांग्रेस हाईकमान ने कभी भी उनकी नाराजगी को ध्यान नहीं दिया। हमेशा नजरअंदाज ही किया जाता रहा। कहा जाता है कि शंकर सिंह वाघेला ही कांग्रेस पार्टी के पास ऐसे नेता थे जो बीजेपी की रणनीति को समझकर उस पर फौरन कार्रवाई करते थे। लेकिन, उनके पार्टी से जाने के बाद अब ऐसा कोई भी नेता नहीं है जो ये काम कर सके। ऐसे में गुजरात की राजनीति को समझने वाले जानकारों का कहना है कि विधानसभा चुनाव से पहले ही मोदी की जीत और कांग्रेस की हार तय हो गई है।

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