वन नेशन, वन इलेक्शन को लेकर बैठक 16 को

देश में विधानसभा और लोकसभा के चुनाव एक साथ कराने पर चर्चा चल रही है। केंद्र सरकार चाहती है कि इस मुद्दे पर आम राय बने और सभी दल बैठकर इसका हल निकालें ताकि सालभर होने वाले चुनाव पर रोक लगे और सरकारी खर्च भी बचे। हालांकि इसको लेकर बात काफी आगे बढ़ चुकी है पर कोई ठोस फैसला आने में अभी वक्त लग सकता है। इस बीच चुनाव आयोग और विधि आयोग देश में 'एक देश एक चुनाव' को लेकर सक्रिय हो गए हैं और इस संबंध में दोनों आयोग इससे संबंधित एक अहम बैठक 16 मई को करने जा रहे हैं।

बता दें कि विधि आयोग ने पिछले पखवाड़े हुई बैठक के दौरान इस संबंध में एक प्रश्नावली जारी की थी, जिसके जरिए आयोग की ओर से आम जनता, संस्थान, एनजीओ और नागरिक संगठनों के साथ सभी स्टेकहोल्डरों से इस संबंध में सुझाव मांगे गए थे।

जानकारी के अनुसार कहा जा रहा है कि जुलाई के अंत तक देश में एक साथ चुनाव कराने के उपाय और जरुरी कानून और संविधान संशोधन पर विधि आयोग की रिपोर्ट आ सकती है। इसी रिपोर्ट की तैयारी के सिलसिले में ही दोनों आयोगों की बैठक हो रही है।

कहा जा रहा है कि आयोग 16 मई को होने वाली बैठक में चुनाव से जुड़ी तकनीकी और व्यवहारिक बातों की जानकारी लेगा। आयोग का मानना है कि इसे अमलीजामा पहनाने के लिए जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन करने पर विचार होगा. साथ ही 'एक साथ चुनाव' की परिभाषा भी तय करनी होगी।

जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 2 में संशोधन का प्रस्ताव भी किया है। साथ ही अविश्वास प्रस्ताव की जगह कन्स्ट्रक्टिव वोट ऑफ नो कॉन्फिडेन्स के रूप में एक नई व्याख्या शामिल करना भी आयोग के विचारों के दायरे में होगा। इसके लिए लोकसभा नियमावली में धारा 198A जोड़ी जा सकती है। ऐसा ही नियम राज्य की विधानसभा नियमावली में भी जोड़ा जा सकता है।

इसके साथ ही आयोग कहना है कि त्रिशंकु लोकसभा या विधानसभा की स्थिति में दलबदल कानून के पैराग्राफ 2 (1) (ब) को अपवाद मानने का संशोधन किया जाए। संविधान के अनुच्छेद 83 और 172 के साथ ही जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की धाराएं 14 और 15 में संशोधन कर लोकसभा और विधानसभा के मध्यावधि चुनाव सिर्फ बची हुई अवधि के लिए शासन संभालने का प्रावधान कराया जा सकता है। केंद्र सरकार राज्यों के बहुमत से इन संशोधन प्रस्तावों पर सहमति ले सकती है ताकि भविष्य में किसी भी तरह की कानूनी चुनौतियों के चक्कर से बचा जा सके।

वहीं स्थायी सरकार के लिए एक और व्यवस्था की जा सकती है कि लोकसभा या विधानसभा के स्पीकर की तरह सदन में सबसे बड़ी पार्टी के नुमाइंदे को प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री चुना जाय जिससे ऐसी स्थिति में होनी वाली रणनीतिक क्लेश पर विराम लगाया जा सके। आयोग की ओर से सभी के लिए जारी की गई इस प्रश्नावली के जरिए या इससे अलग भी सुझाव देने का अधिकार दिया गया है।

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