उपलब्धियों के बोझ तले दब गई संतोषी!

रघुवर सरकार के तीन साल हो गए। मुख्यमंत्री रघुवर दास ने आज अपने 3 साल की उपलब्धियों का रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने रखा है। अपने फैसलों और उसके प्रभाव पर भी खूब चर्चा की है। सरकार कह रही है कि राज्य की सवा तीन करोड़ जनता खुश है, उसके सपने साकार हो चुके हैं। इसके आंकड़े भी दिखाए गए और इस प्रकार तीन साल का ये जश्न-ए-महफिल फिर अगले साल के लिए सैकड़ों वादों की आतिशबाजी के साथ खत्म हो गयी।

लेकिन इन सब सरकारी नुमाइशों से दूर जनता रघुवर सरकार के एक-एक काम का हिसाब रख रही है, इनकी उपलब्धियों का ढोल जनता की परेशानियों को कितना कम कर पाया है! कितने स्कूलों को शिक्षक मिले, कितने अस्पतालों को डॉक्टर मिले! तमाम घोषणाओं का सच लोगों के सामने है। आम झारखंडी यह भी देख रहा है कि स्वच्छता के नाम पर बने शौचालयों की हकीकत क्या है, हर गांव में बिजली पहुंचाने की सच्चाई भी लोगों के सामने है।

दावे तो कई हैं! लेकिन घर-घर अनाज पहुंचाने पर भी संतोषी आखिर मरती क्यों है। विकास की रौशनी में अगर हर टोले, हर बस्ती में पहुंची तो गांववालों के चेहरे पर उदासी क्यों है। पुल और सड़कें बनी हैं तो बच्चियां पगडंडियों और नदी-नाले से होकर स्कूल जाती क्यों हैं। लाखों को रोजगार मिला है तो राजधानी रांची से सैकड़ों गरीब सब्जी बेचने वाले, खोमचे वाले, ठेले वाले का रोजगार छीना किसने। सरकार खुश है तो राज्य के आवाम के चेहरे पर उदासी क्यों है। ये कई सवाल हैं जो आम जनता को 3 साल के जश्न के मौके पर सालते दिख रहे हैं।

मुख्यमंत्री रघुवर दास के मोमेंटम झारखंड के जश्न की कलई खुलती जा रही है। कागजों पर हुए गड़बड़झाले ने राज्य की जनता को झकझोर दिया है। सरकार की योजनाएं बन तो जरूर रही हैं पर दिक्कत इस बात की है कि जमीन पर वो ढूंढने से नहीं मिल रही हैं, अब इन गुमशुदा योजनाओं को जनता कहां खोजे जब सरकार को ही नहीं मिल रही हैं।

देखा जाय तो सरकार पिछले 3 सालों में योजनाओं, कार्यक्रमों का उत्सव मनाती रही, वादे करती रही, दावे करती रही, उपलब्धियों का ढोल पीटती रही। और बेबस जनता मन मसोसकर देखती रही। जश्न के इस शोर में अगर वक्त मिले तो सरकार इस पर भी जरा सोचे।

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