क्या विधानसभा चुनाव से पूर्व हटाई जाएंगी वसुंधरा !

पीएम मोदी की लोकप्रियता के तमाम दावों और राजस्थान में वसुंधरा के जबर्दस्त सियासी दांवपेंच के बावजूद कांग्रेस के हाथों मिली करारी हार से बीजेपी आलाकमान हिला हुआ है। गुजरात के बाद राजस्‍थान में कांग्रेस का बढ़ता कद बीजेपी के लिए आगामी खतरे के संकेत हैं। देखा जाय तो राजस्थान में 10 महीने बाद विधानसभा चुनाव होने हैं, और उसके ठीक बाद लोकसभा चुनाव होने हैं पर कांग्रेस के इस पटकनी से पार्टी जैसे सिहर गई है।

ध्यान रहे कि ये सभी सीटों पहले बीजेपी के पास थीं। लेकिन कांग्रेसी कैंडिडेट न सिर्फ जीते बल्कि इन चुनावों में बड़े अंतर से जीत दर्ज करने में सफल रहे। हालांकि इन सब के बावजूद बीजेपी नेता इसे पीएम मोदी या पार्टी की घटती लोकप्रियता का संकेत मानने से इंकार कर रहे हैं, लेकिन सीएम वसुंधरा राजे के लिए अपनी सत्‍ता बचाए रखना बड़ी चुनौती हो सकती है। इसका बड़ा कारण यह है कि कांग्रेस सभी 17 विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा से आगे रही है। इनमें अलवर और अजमेर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली 16 सीटें भी शामिल हैं।

जानकारों की मानें तो राजस्‍थान में जिन सीटों पर चुनाव हुए हैं, वे राज्‍य के अलग-अलग हिस्‍सों में हैं। अलवर हरियाणा की सीमा से लगा हुआ है जबकि अजमेर राज्‍य के बीचों बीच स्थित है और मंडलगढ़ मध्‍यप्रदेश के नजदीक है। इसका स्‍पष्‍ट मतलब है कि पूरे प्रदेश में राज्‍य सरकार के प्रति एक जैसा माहौल है। महत्‍वपूर्ण यह भी है कि इन सभी सीटों पर पिछले चुनावों में भाजपा बड़ी बढ़त के साथ जीती थी। वहीं राज्‍य के उपचुनावों से पार्टी के केंद्रीय नेतृत्‍व ने खुद को अलग रखा था। उम्‍मीदवारों के चयन से लेकर प्रचार तक की पूरी जिम्‍मेदारी मुख्‍यमंत्री ने खुद संभाली थी। लेकिन पिछले कई महीनों से लगातार विवादों से जूझ रहीं सीएम वसुंधरा राजे पार्टी को जीत नहीं दिला पाईं। राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो चुनावी नतीजों में इन विवादों की महत्‍वपूर्ण भूमिका है। राज्‍य में किसानों के आंदोलन, गुर्जर आरक्षण विधेयक पर हाई कोर्ट की रोक, गौसेवकों के विवाद और फिर पद्मावत विवाद ने वसुंधरा सरकार के लिए हालात पर जबर्दस्त प्रभाव डाले हैं। पद्मावत मामले और आनंदपाल के इनकाउंटर ने जातिगत समीकरण भी कांग्रेस के पक्ष में कर दिया।

वसुंधरा के लिए चुनौतियां पार्टी के अंदर से भी हो सकती है। विधानसभा चुनावों को ध्‍यान में रखते हुए पार्टी का केंद्रीय नेतृत्‍व भी उन पर दबाव बना सकता है। हालांकि इसकी संभावना कम है कि उन्‍हें चुनावों से पहले पद से हटाया जाएगा, लेकिन टिकट बंटवारे से लेकर प्रचार अभियान में संगठन की भूमिका महत्‍वपूर्ण हो सकती है।

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