क्या है भूमि अधिग्रहण संशोधन का पूरा सच !

आज की विपक्ष की बंदी बेहद सफल मानी जा सकती है. पर क्या है इस बंदी का मकसद ! जानकार कहते हैं केवल सियासी फायदा. दरअसल विपक्ष भी इस मुद्दे पर अपने सियासी फायदे के लिए आम जनता को गुमराह ही कर रहा है.राज्य सरकार कह रही है कि आम लोगों की जमीन केवल सरकारी योजनाओं के लिए ली जाएगी, जबकि विपक्ष राज्य सरकार की मंशा पर सवाल उठाकर बेहद चतुराई से इसे भूमिपुत्र आदिवासियों से जोड़ रहा है.
यानि सवाल कुछ और है जवाब कुछ और ही तलाशने की कोशिश! मकसद साफ़ है, कहीं पर निगाहें, कहीं पर निशाना साध रहा है विपक्ष.
राज्य सरकार ने भूमि अधिग्रहण संशोधन में सामाजिक अंकेक्षण की अनिवार्यता को खत्म किया है. राज्य सरकार का तर्क है कि इस वजह से जमीन लेने की प्रक्रिया बेहद लम्बी और जटिल हो जाती है. हालांकि राज्य सरकार के इस तर्क में दम नहीं है. अगर सोशल ऑडिट की प्रक्रिया भूमि अधिग्रहण को जटिल बनाती थी तो उसे सरल करने के उपाय तलाशे जाने चाहिए. लेकिन बगैर सामाजिक अंकेक्षण के किसी जमीन को लेना कुछ सवाल तो खड़े करेगा ही साथ ही एक स्तर पर पारदर्शिता भी घटेगी.
लेकिन विपक्ष के नेता अलग ही राग गाने लगे हैं, वो जनता को यह कहकर भरमा रहे हैं कि सरकार अपने लैंड बैंक को निजी घरानों के लिए रखना चाहती है और आम लोगों की जमीन अधिग्रहित कर उसे सरकारी कार्यक्रम के लिए इस्तेमाल करना चाहती है जो गलत है. इसी बहाने विपक्ष के नेता जनता को वापस सरकार के खिलाफ जल, जंगल और जमीन के सवाल पर गोलबंद कर रहे हैं.
सवाल पुर्णतः राजनीतिक है. आज की बंदी भी राजनीतिक है और इसके निहितार्थ भी शुद्ध रूप से सियासी हैं. येन केन प्रकारेण सत्ता हासिल करना. झूठ दोनों तरफ से बोले जा रहे हैं. अब तय आम लोगों को करना है कि दोनों ही पक्षों के झूठ में से किसे अपनाना है और किसे ठुकराना है !

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