बिल्ली के गले में पहली घंटी बाँधी यशवंत सिन्हा ने

-मोदी ब्रिगेड से क्यों नाराज है पूर्व वित्त मंत्री सिन्हा

जेटली बम को फुस्स बताकर पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने दरअसल मोदी पर बड़ा राजनीतिक हमला किया है। रसातल में जाती देश की अर्थव्यवस्था और लगातार बढ़ रही बेरोज़गारी से भाजपा के कई नेता असहज हैं। ऑफ द रिकॉर्ड कई नेता यह बोलते भी हैं लेकिन भाजपा में बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे वाली बात है। कोई भी मोदी ब्रिगेड के खिलाफ बोलकर अपनी राजनीतिक समाधि नहीं कराना चाहता। ऐसे में पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने बिल्ली के गले में घंटी बाँधने की हिम्मत दिखाई। यह राजनीतिक घंटी इतनी तेज़ बजी कि अरुण जेटली तो कुछ नहीं बोल पाये पर कांग्रेस ने इसे तुरंत लपक लिया।

इससे पहले हालाँकि संघ से जुड़े मजदूर संगठन भारतीय मजदूर संघ ने भी केंद्र की आर्थिक नीतियों की मुखालफत की थी। पर सर्वशक्तिमान जेटली ने उस आलोचना को भी हवा में उडा दिया। इसलिए एक अंग्रेजी अखबार में लेख लिखकर यशवंत सिन्हा ने जेटली के बहाने सीधा मोदी की कार्यशैली पर हमला बोला। उन्होंने कहा कि चुनावी नतीजे आने से पहले ही सबको पता था कि जेटली ही वित्त मंत्री बनेंगे। लोकसभा हारने के बाद भी वही वित्त मंत्री बने। अटल सरकार में प्रधानमंत्री ने लोकसभा हारने की वज़ह से जसवंत सिंह और प्रमोद महाजन को मंत्री नहीं बनाया था, जबकि वो दोनों ही उनके बेहद करीब थे। यह कहकर यशवंत सिन्हा ने मोदी के राजधर्म पर सवाल उठाये हैं।

अब जब लोकसभा चुनावों में दो वर्ष से कम का समय रह गया है, क्या भाजपा का विक्षुब्ध खेमा हिसाब बराबर कर रहा है। इस सवाल पर पार्टी के एक थिंक टैंक ने कहा कि इस निजाम ने कई अच्छी बातें की हैं, लेकिन इनमें सबको साथ लेकर चलने का बड़ा दिल नहीं है। एक अघोषित आपातकाल है पार्टी के अंदर, जहाँ अपनी बात नहीं, तय स्क्रिप्ट ही बोलना है। इस निजाम में केवल हां कहने की आज़ादी है। ऐसा कब तक चल सकता है। सबने देखा कि आडवानी जी के साथ क्या हुआ, यशवंत सिन्हा के साथ क्या हुआ, मुरलीमनोहर जोशी के साथ क्या हुआ, जसवंत सिंह के साथ क्या हुआ, संजय जोशी के साथ क्या हुआ। पार्टी का शीर्ष नेता जब कोटरी के हिसाब से चलने लगे तो पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र कहां बच जाता है।

ऐसे में अर्थव्यवस्था की सुस्त रफ्तार पर अपनी ही पार्टी के नेतृत्व को कठघरे में खड़ा कर यशवंत सिन्हा ने भाजपा में एक समानांतर केंद्र बनाने की कोशिश की है, एक ऐसा केंद्र जो संघ के भी करीब है और भाजपा संस्थापकों के भी। आने वाले समय में बहुत सारे लोग यशवंत की भाषा बोलने लगें तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। दरअसल चाणक्य की भाषा में यह ऐसा अर्थशास्त्र है जो राजनीति की भी तथ्यात्मक पड़ताल कर रहा है।

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