विलेन क्यों बने अशोक चौधरी !

बिहार कांग्रेस के भूतपूर्व अध्यक्ष अशोक चौधरी इन दिनों प्रदेश प्रभारी सीपी चौधरी पर तरह-तरह के आरोप लगा रहे हैं. आखिर ऐसा क्यों है! अशोक चौधरी सार्वजनिक तौर पर क्यों कह रहे हैं कि जोशी उन्हें पद से हटाने में लगातार लगे हुए थे. अगर ऐसा था तो आलाकमान से मिलते वक़्त उन्होंने जोशी की शिकायत उन्होंने किस से की थी. नए प्रदेश अध्यक्ष बोल रहे हैं कि अशोक चौधरी को दो-दो बार बीपीसीसी चीफ बनाकर पार्टी ने जरुरत से ज्यादा सम्मान दिया.

दरअसल अशोक चौधरी जब मंत्री थे और नीतीश से उनकी खूब जमती थी तो उन्होंने कई कांग्रेस नेताओं की पैरवी नहीं की थी. कुछ लोगों ने जब जोशी से कहवाया तब भी अशोक चौधरी ने असमर्थता जाहिर कर दी थी. ये अलग बात है कि विभागीय सचिव उनकी सुनते ही नहीं थे. लब्बोलुआव ये कि मंत्री रहते अशोक चौधरी ने कई पार्टी नेताओं को अपना दुश्मन बना लिया. जैसे ही सरकार गयी, सभी ने ये बात फैला दी कि चौधरी नीतीश कुमार के प्रभाव में हैं और पार्टी की जड़ें खोद रहे हैं. इसी गलत तथ्य को सोनिया और राहुल के सामने बार-बार रखा गया और निश्चित रूप से इसमें सीपी जोशी की भूमिका एकपक्षीय रही.

आज अशोक चौधरी पार्टी के अंदर विलेन बनाये जा रहे हैं, लेकिन कांग्रेस को यह नहीं भूलना चाहिए कि विधायकों की इतनी संख्या उनके रहते ही आयी. दूसरी महत्वपूर्ण बात जो चौधरी कह रहे हैं, उसे भी सुनना चाहिए. चौधरी कह रहे हैं कि गठबंधन सरकार में वो मंत्री थे, इस हिसाब से भी मुख्यमंत्री और महागठबंधन के नेता के रूप में नीतीश से अच्छा सम्बन्ध रखना ही था उन्हें. यह ईमानदार स्वीकारोक्ति है.

दलित नेता चौधरी एक दूसरी बात भी कह रहे हैं कि नीतीश की छवि लालू से बेह्तर है.इसमें भी कोई शक नहीं है कि राजनीतिक रूप से लालू भले ही ज्यादा स्वीकार्य हैं बिहार में. उनका जनाधार यादवों और मुसलमानों की वज़ह से नीतीश से ज्यादा है. लेकिन लोक छवि के पैमाने पर नीतीश कुमार कहीं ज्यादा हैं. अब कांग्रेस ने लालू के साथ रहने का पक्ष चुना है तो उसका अपना तर्क भी होगा. और इस तर्क में अशोक चौधरी कहीं फिट नहीं हो रहे, लिहाज़ा उन्हें जाना पड़ा.

यहीं अशोक चौधरी यह भूल गए कि वो पार्टी के नीति नियामक नहीं हैं, सिपाही अगर सेनापति बनने की गलती करे तो उसका यही अंजाम होता है, कांग्रेस ने यही सन्देश देने की कोशिश की है.

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