हजार दिन सरकार के, हजार अफ़साने आपके

-इन मासूमों की मौत का गुनाहगार कौन!
रघुवर सरकार 1000 हजार दिन की उपलब्धियों का जश्न मनाने जा रही है। सरकार के सभी मंत्री प्रदेश भर में घूम- घूमकर जनता को अपने कामों का ब्योरा देंगे। ढूंढ- ढूंढकर अपने किये कामों का बखान करेंगे। बेबस जनता सुनेगी भी। पर उसे यह आश्चर्य जरूर होगा कि सरकार के किये कामों की तलाश वह कहां करे। वह तो सड़क पर है, वहीं है जहां वर्षों से रहती आयी है। और वहां कुछ भी वैसा नहीं हुआ जिसे वह देखकर खुश हो और सरकार की उपलब्धि का साझेदार बने।

क्योंकि मीलों दूर से जब वह अपने बीमार परिजनों का इलाज कराने राज्य के सबसे बड़े अस्पताल में आता है तो निराश होकर लौटता है। अपनों की अर्थी लेकर घर लौटता है। इस बड़े अस्पताल का हाल ये है कि पिछले 28 दिनों में यहां 133 बच्चों की मौत हो गई। उधर जमशेदपुर के एमजीएम अस्पताल में 61 बच्चों की मौत हो गई। लेकिन इसपर कोई ठोस कार्रवाई करने की बजाय सरकार ने इस ओर से आखें मूंद ली है। विपक्ष इस मामले को लेकर सड़क पर है। विपक्ष ने राज्य सरकार के आंकड़ों को झूठा बताया है। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि इस संवेदनशील मामले पर स्वास्थ्य मंत्री को क्यों नहीं कटघरे में खड़ा किया जा रहा है। क्या सरकार के 1000 दिनों की उपलब्धियों को जनता के बीच रखते समय वे इन मासूमों की मौत की जिक्र भी करेंगे।

वहीं दूसरी ओर राज्य की एक और भयावह तस्वीर निकल कर सामने आयी है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-4 (एनएफएचएस-4) 2015-16 की रिपोर्ट के अनुसार झारखंड में पांच वर्ष तक के 47.8 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं। राज्य पोषण मिशन के बेसलाइन सर्वे से यह पता चला है कि इनमें से करीब चार लाख बच्चे अति कुपोषित हैं। इन्हीं बच्चों की जिंदगी को बचाना बड़ी चुनौती है। देश की प्रतिष्ठित संस्था राष्ट्रीय पोषण संस्थान, हैदराबाद की रिपोर्ट से भी झारखंड में बच्चों व महिलाओं की स्वास्थ्य संबंधी दयनीय स्थिति की पुष्टि हो चुकी है।

इन सबके बीच राज्य सरकार यह लगातार दावे कर रही है कि स्वास्थ्य चिकित्सा के क्षेत्र में व्यापक सुधार किया गया है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर आंगनबाड़ी केंद्रों की बदहाल स्थिति पर महालेखाकार ने तीन वर्ष पहले जो रिपोर्ट दी थी स्थिति कमोबेश वही है।

सरकार के स्वास्थ्य मंत्री रामचंद्र चंद्रवंशी से जब इस बाबत सवाल किया जाता है तो वे मीडिया से ही उलझते दिखायी देते हैं। मुख्यमंत्री रघुवर दास राज्य के आदिवासियों को हर सुविधा देने की बात करते हैं। लेकिन भूल जाते हैं कि उन्हें बेहतर स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराना भी उतना ही जरूरी है, जितना उनके धर्म परिवर्तन न करने की हिमायत करना। दूर- दराज के अधिकतर गांवों में चिकित्सा की कोई व्यवस्था नहीं है। आज भी लोग झोला छाप डॉक्टरों के भरोसे जी रहे हैं। न तो बिजली, न पीने का शुद्ध पानी.... सरकारी योजनाओं की भारी- भरकम बातें न तो वे समझ पाते हैं न ही देख पाते हैं। सरकार की बड़ी-बड़ी योजनाओं को शायद ही जमीन मयस्सर हो पाती है। और हर पांच सालों में उपलब्धियों के साथ सरकारें उनके सामने खड़ी हो जाती हैं। ऐसे में लोगबाग़ हजार दिनों के हजार अफ़साने गाने को ही बाध्य हैं।

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